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संवेदनशील नेहरू का शिमला से था गहरा रिश्ता

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नेहरू की पहचान एक संवेदनशील राजनेता की रही है। उनका खुद का जीवन ऐशो आराम में बीता लेकिन गरीबों के प्रति उनमें बेपनाह हमदर्दी थी। पहाड़ों के प्रति नेहरू में गजब का आकर्षण था। वह उन बि्रटिश हुक्मरानों जैसे थे जिनका मन गर्मियों में पहाडों की तरफ भागता था। वह हिमाचल के कई पहाडी इलाकों में घूमते।
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अपने विदेशी दोस्तों को यहां के पहाड़ घुमाते। हिमाचल में मनाली उनकी पसंददीदा जगह थी। लेकिन कहते हैं शिमला उन्हें पसंद नहीं था। इसकी सबसे बड़ी वजह वे कुली थे जो रिक्शे पर सवारियां बैठाकर उन्हें अपने हाथों से खींचते थे। 1945 में खान अब्दुल गफ्फार खान के साथ टहलते हुए उन्होंने देखा कि कैसे वही कुली ब्रिटिश राज में भी अपने रिक्शों पर तिरंगा लगा कर घूमते थे।

पटेल की इन रिक्शों पर माल रोड घूमने की तस्वीरें हैं। लेकिन नेहरू खुद कभी इन रिक्शों पर नहीं बैठे। इस प्रथा को नेहरू मानवीय प्रतिष्ठा के लिए बेहद अपमानजनक मानते थे। शिमला को नापसंद करने का सिर्फ यही अकेला कारण नहीं था। उन्हें लगता कि यह शहर अंग्रेजों की नकल पर एक कस्बे की तरह बसा है।
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अपनी किताब लास्ट डेज आफ द ब्रिटिश राज में लियोनार्ड मोसले ने शिमला के प्रति नेहरू की वितृष्णा का जिक्र किया है। वायसराय ने तय किया था कि भारत पाकिस्तान के बीच बंटवारे की अंतिम बातचीत शिमला में होगी। वे 1947 की गर्मियों के दिन थे। वायसराय लेडी माउंटबेटन को लेकर कुछ दिन पहले शिमला आ गए थे। वह अपने साथ कोई 350 नौकर चाकर लाए थे।
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खुले दिल के थे पंडित नेहरू

शिमला की ठंडी और ताजा हवा उनमें एक खास तरह की ऊर्जा भर देती थी। पंडित नेहरू भी अपने खास सलाहकार कृष्‍ण मेनन के साथ वायसराय के मेहमान बन गए। उन दिनों का जिक्र करते हुए लियोनार्ड ने लिखा-शिमला की शाम की तरह राजनीतिक संभावनाएं भी सुहानी लग रही थीं।

पहाड़ की गोद में छिपे पगडंडी के रास्ते पर कैम्पबेल-जॉनसन के घर जाते हुए नेहरू ने वायसराय और उनकी पत्नी का साथ दिया। नेहरू का दिल खुला हुआ था। नेहरू ने साथ चलने वालों को बताया कि पहाडों पर चढ़ाई के वक्त किस तरह सांस और शक्ति में तालमेल बैठकर उसके अपव्यय को रोका जाता है। बच्चों के साथ वे कूदते रहे, बंदरों की तरह उछल कूद कर हंसते रहे। वायसराय भवन लौटते वक्त शिमला को देखकर उनके चेहरे पर सिर्फ एक वितृष्‍णा आई।

बेशक ये आजादी के पहले का शिमला था। अंग्रेजों के जाने के साथ कई बुरी प्रथाएं उनके साथ चली गईं। कई अच्छी चीजें रह गईं जो अब तक बरकरार हैं। शिमला एक खूबसूरत शहर था और है। इसकी हवा में वैसी ही ठंडक और ताजगी अब तक आप महसूस कर सकते हैं। यही वजह है कि यह आज भी सबसे पसंदीदा हिल स्टेशन है। नेहरू की इस 125वीं जयंती पर उन्हें याद करके हम अहद ले सकते हैं कि हम शिमला के गौरव को बरकरार रखें और यहां ऐसी कोई परम्परा शुरू न होने दें जिसे लेकर किसी के मन में वितृष्‍णा जन्म ले।
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