रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य में पूंजीगत व्यय में 22 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई लेकिन कुल वित्तीय उधार में भी 2017-18 की तुलना में वित्त वर्ष 2018-19 में 6.41 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह देनदारी राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 36 प्रतिशत और आय का 1.75 गुणा हो गई है। सार्वजनिक ऋण में भी पिछले वित्त वर्ष की तुलना में पांच फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्तमान में कुल 26,573 करोड़ के मार्केट लोन और उदय बाॅंड के लिए राज्य को अगले दस साल में 25,005 करोड़ के मूल और 12,521 करोड़ का ब्याज चुकाना होगा।
कहीं अत्यधिक खर्च तो कहीं भारी राशि हुई सरेंडर
रिपोर्ट में कहा गया है कि वित्तीय प्रबंधन सही न होने और बजट अनुमान सही न होने की वजह से अत्यधिक राशि खर्च या सरेंडर की गई है। 18 उप मद में 617.17 करोड़ का अतिरिक्त व्यय हुआ जबकि 12 उप मद में 196.22 करोड़ बच गए। 155 उप मद में 2,851 करोड़ के कुल प्रावधान में से 2328.5 करोड़ (78.87 फीसदी) राशि सरेंडर हो गई। विभिन्न स्कीमों के 60 मदों में तो शत-प्रतिशत राशि सरेंडर हुई जो 801.05 करोड़ थी।
सीएजी की रिपोर्ट में बजट प्रावधान और वास्तविक आंकड़ों में भारी भिन्नता मिली। रिपोर्ट के अनुसार साल 2018-19 में बजट प्रावधान से 821.37 करोड़ अधिक व्यय किया गया। बजट अनुमान के अनुसार राजस्व प्राप्तियां 30 हजार 400 करोड़ होनी थीं, जबकि राजस्व प्राप्तियां असल में 550 करोड़ ज्यादा हुईं। इसी तरह अनुमान में दावा किया गया था कि 8248 करोड़ का कर संग्रह होगा, जबकि असल में 7573 करोड़ ही प्राप्तियां हुई।
इनमें वैट और जीएसटी के अंतगर्त राजस्व कम प्राप्त हुआ। इसके अलावा राजस्व व्यय का बजट में 33568 करोड़ का अनुमान था जबकि खर्च 12 प्रतिशत कम 29 हजार 442 करोड़ हुआ। पूंजीगत व्यय, अनुमानिनत राजस्व घाटा, राजकोषीय घाटा, प्राथमिक घाटा भी बजट के अनुमान से भिन्न रहा। वास्तविक और अनुमानित आंकड़ों में जो अंतर सामने आया उससे साफ है कि बजट बनाते समय अनुमानित प्राप्तियों व व्यय का उचित रूप से आंकलन नहीं किया गया।
श्रमिकों के कल्याण के लिए बने भवन एवं अन्य निर्माण कार्य श्रमिक कल्याण बोर्ड ने वित्त वर्ष 2018-19 के दौरान श्रमिक उपकर व ब्याज के रूप में 102.24 करोड़ प्राप्त किए जबकि श्रमिक कल्याण योजनाओं पर महज 24.36 करोड सहित कुल 27.03 करोड़ ही खर्च किए। खास बात यह है कि 31 मार्च 2019 तक बोर्ड के पास 590.97 करोड़ रुपये बचे हुए थे।
रिपोेर्ट में कहा गया है कि इतनी बड़ी राशि के प्रयुक्त न होने से साफ है कि या तो बोर्ड मौजूदा कल्याण योजनाओं पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहा या फिर निर्माण कर्य श्रमिकों के लाभ के लिए नई योजनाएं नहीं बनाई जा रहीं। जबकि बोर्ड इस राशि को कल्याण योजनाओं के लिए ही भवन एवं अन्य निर्माण कार्य श्रमिक कल्याण उपकर अधिनियम के तहत नियोजकों से वसूलती है।