इस वजह से रखा गया सच्चे जोत नाम
जैसे चैहनी नाम से चैहनी पास, पधरी नाम से पधरी जोत, दराटी आकार के नाम से दराटी जोत इसी प्रकार जोत पर विद्यमान सचे जोत वाली माता के नाम पर सचे जोत था। इसका गलत उच्चारण के कारण ये साच पास बन गया। वैसे भी इस जोत के आसपास साच नाम की कोई जगह न चुराह में है और न ही पांगी में। लंबी जद्दोजहद के दौरान प्रदेश सरकार, राजस्व विभाग, वित्त सचिव, लोक निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता और जिला प्रशासन के पास ये मामला पहुंचने के बाद अब आखिरकार गलत उच्चारण साच पास हो हटा कर लोक निर्माण विभाग मंडल पांगी की ओर से सचे जोत को सूचना पट्ट पर अंकित कर दिया है।
आठ सालों से सरकार के पास उठाया मामला
पांगी कल्याण संघ पांगी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष बृज लाल ठाकुर ने बताया कि उपयुक्त गलत नाम को दुरुस्त करवाने के लिए पांगी के करयूनी गांव के नारायण सिंह (सेवानिवृत्त बैंक अधिकारी) ने अहम योगदान दिया। उन्होंने करीब 8 साल से निरंतर प्रदेश सरकार, राजस्व, वित्त सचिव, मुख्य अभियंता और प्रशासन के समक्ष मामला सचे े जोत का बोर्ड लगा दिया है। जिला भाषा अधिकारी तुकेश कुमार शर्मा ने बताया कि वर्ष 1965 के गजट में सचेे जोत का जिक्र है। इसके उपरांत लोगों ने अपनी सहूलियत के हिसाब से शायद सचेे जोत की जगह साच पास का उच्चारण करना आरंभ किया।
जुड़ी हैं धार्मिक भावनाएं
सचे जोत के साथ पांगवाल समुदाय की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हैं। पांगी घाटी का कोई भी व्यक्ति इस जोत की तरफ जाता है तो घर से धूप जलाकर पूजा करने के बाद ही प्रस्थान करता है। पुराने समय से ये इकलौता रास्ता पांगी से बाहर जाने का रहा है।
लौट गए थे आतंकवादी
मुगल काल में पंगवाल अपने धर्म की रक्षा के लिए इस जोत को लांघ कर घाटी में बसे थे। इसी कारण आज भी घाटी में मात्र हिंदू लोग हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि मुगलों के आतंकवादी इस जोत के रास्ते पांगी आने लगे तो जोत पर उनकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया और आगे का रास्ता नहीं दिखाई दिया। तब वे उल्टे पांव वापस चले गए।