कोर्ट ने आदेश में स्पष्ट किया कि मामले में आरोपियों पर संदेह उजागर किया, लेकिन यह लीगल प्रूफ का रूप नहीं ले सका। अभियोजन की ओर से बताई और रिकॉर्ड से जोड़ी परिस्थितियां पूर्ण नहीं हैं। इससे आरोपियों पर दोष सिद्ध नहीं होते हैं।
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक प्रवृत्ति के आरोप साबित नहीं कर पाया है। जिस तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर विजिलेंस ने जांच शुरू की। उसका रिकॉर्ड भी अपूर्ण बताया।
मंत्री को भी थी लपेटने की थी तैयारी
इस मामले में कांग्रेस सरकार में रहे मंत्री को भी लपेटने की तैयारी थी। माना जा रहा था कि अधिकारियों ने इस घपले को राजनीतिक शह में अंजाम दिया। तत्कालीन धूमल सरकार इस मामले को उससे पिछली वीरभद्र सरकार के खिलाफ लगातार मुद्दा भी बनाती रही, मगर पूर्व मंत्री और किसी नेता के खिलाफ सुबूत नहीं जुटाए जा सके।
आरोपियों की पूर्व मंत्री से बातचीत की सीडी भी हुई वायरल
कुछ आरोपियों की तत्कालीन कांग्रेस सरकार के पूर्व मंत्री से हुई बातचीत की एक सीडी भी इस मामले में खूब वायरल हुई। चर्चा यह रही कि इस सीडी को गुप्तचर महकमे ने तैयार किया था।