वर्ष 1650 में अयोध्या से भगवान रघुनाथ की मूर्ति लाई गई। तत्कालीन राजा जगत सिंह ने अपना राजपाठ भगवान रघुनाथ को सौंपकर छड़ीबरदार के रूप में उनकी सेवा करने का संकल्प लिया। तब से ढालपुर मैदान में दशहरा उत्सव का आयोजन किया जा रहा है।
आज भी जगत सिंह के वंशज देव परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं। घाटी के 365 देवी-देवताओं को दशहरे का न्योता दिया जाता है। रथ यात्रा में भगवान रघुनाथ के दायीं ओर चलने को लेकर देवता शृंगा ऋृषि और बालू नाग का विवाद आज तक जारी है।
इस बार भी नहीं होगी पशु बलि
कुल्लू दशहरा उत्सव में इस पर भी पशु बलि नहीं होगी। एसपी शालिनी अग्निहोत्री ने बताया कि सार्वजनिक रूप से पशु बलि पर प्रतिबंध है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सशर्त दशहरा उत्सव में पशु बलि की राहत दी थी, लेकिन शर्तें पूरी न होने के कारण इस बार भी बलि नहीं होगी।