अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में इस बार देवताओं को जीप या किसी अन्य वाहन में लाने पर नजराना नहीं मिलेगा। पैदल चलकर कंधों में ही देवरथ लाने पर नजराना राशि मिलेगी। देव परंपरा को बनाए रखने के लिए कुल्लू दशहरा कमेटी ने यह फैसला लिया है।
कुल्लू दशहरा के इतिहास में ऐसा पहली बार होगा। करीब एक सप्ताह तक चलने वाले कुल्लू दशहरा उत्सव में जिले के सैकड़ों देवी-देवता शिरकत करते हैं। कुल्लू दशहरा का यही मुख्य आकर्षण है। इस बार तीन से नौ अक्तूबर तक कुल्लू दशहरा उत्सव होगा।
कुल्लू जिले के दूर दराज क्षेत्रों से मीलों पैदल चल लोग देवरथों को कंधे पर उठा कर ढालपुर मैदान में पहुंचाते हैं। देवता के साथ आए देवलु सप्ताह तक भूमि पर सोते हैं। देव-मानस मिलन के इस पर्व पर शोध के लिए देश विदेश से लोग कुल्लू दशहरा में पहुंचते हैं।
लेकिन कुछ समय से कई लोग देवरथों (पालकियों) को वाहनों में दशहरा उत्सव में लाने लगे हैं। देव समाज से जुड़े कई लोग भी इस पर आपत्ति जताते रहे हैं। इनका तर्क है कि देवरथों को कंधे पर दशहरा में लाने की परंपरा रही है।
अब तक गाड़ियों में आते थे देवता
देव रथों को वाहनों में लाने से यह परंपरा खत्म हो जाएगी। कुल्लू दशहरा समिति के अध्यक्ष एवं उपायुक्त कुल्लू राकेश कंवर ने कहा कि दशहरा उत्सव में दूर दराज से आने वाले कई देवी-देवताओं के हरियान देवरथों को वाहनों में लेकर आते हैं। यह परंपरा एवं देव नीति के खिलाफ है।
नजराने के रूप में मिलती है राशि
दशहरा उत्सव में आने वाले देवी देवताओं को नजराना के रूप में नकद राशि प्रशासन की ओर से दी जाती है। ये राशि कारदारों या प्रमुख हरियानों को दी जाती है। सभी देवी देवताओं को 25 से 30 लाख तक राशि नजराने के रूप में हर साल दी जाती है।
दो सौ किमी दूर से भी आते हैं देवता
कुल्लू और इसके आसपास के स्थानीय देवी-देवताओं के मोहरों को उनके रथों (पालकियों) पर दशहरा उत्सव में लाया जाता है। कुल्लू दशहरा में 150 से 200 किलोमीटर दूर आनी व निरमंड से भी कई देवी देवता आते हैं। ये देवी-देवता एक सप्ताह तक ढालपुर मैदान में रहते हैं। अधिक दूरी होने के कारण कई बार लोग देवरथों को जीप में रखकर ले आते हैं।