कार्रवाई के नाम पर विभाग के पास अभियोग चलाने से लेकर आर्थिक दंड के अधिकार भी हैं। उधर, विभाग के पास बाल श्रम पर रोक न लग पाने के अपने तर्क हैं।
नाम न लिखने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बाल श्रम करते बच्चों को विभाग छुड़ा तो लेता है, लेकिन उनके पुनर्वास को ठोस नीति नहीं है। विभाग की ओर से ऐसे बच्चों को परिवार को सौंपा जाता है या फिर बाल कल्याण आयोग के सुपुर्द किया जाता है।
कई बार छुड़ाए गए बच्चे फिर से बाल श्रम की कुरीति का हिस्सा बन जाते हैं। अधिकारी ने दावा किया कि 21 हजार से ज्यादा निरीक्षण में किसी प्रकार की कोताही नहीं बरती गई।
छह वर्ष के दौरान 31 बच्चों को छुड़ाने के अलावा 41 मामलों में बाल श्रम के आरोप पर अभियोजन चलाया गया। 31 मामलों में लोगों को सजा भी हुई। यही नहीं, 3.37 लाख रुपये उल्लंघन करने वालों से बतौर जुर्माना वसूला गया।
बाल श्रम से छुड़ाए गए बच्चों के पुनर्वास को विभाग एक विशेष फंड का प्रावधान करने जा रहा है। इस फंड से जुटने वाली राशि का इस्तेमाल बच्चों के पुनर्वास पर होगा।
एक अधिकारी ने कहा कि ज्यादातर मामलों में गरीब परिवार के बच्चे ही काम में लगे होते हैं जो अपनी या परिवार की इच्छा से काम में लगे होते हैं। उन्होंने बताया कि फंड के जरिये बच्चों को आर्थिक मदद देने का प्रयास होगा
ताकि बालिग होने तक उन्हें बाल श्रम न करना पड़े। हालांकि जब तक ऐसा फंड तैयार नहीं होता, तब तक बच्चों को बाल श्रम से बचाया तो जा सकता है लेकिन उन्हें या उनके परिवारों को रोकना मुश्किल है।