यात्रा मार्ग पर पत्थरों से छोटे मकान बनाकर यहां लोग अपने अगले जन्म को सार्थक करते हैं। मणिमहेश यात्रा के विभिन्न पड़ावों में ऐसी मान्यता सदियों से चली आ रही है। वर्तमान में भी शिवभक्त पत्थरों से न सिर्फ छोटे-छोटे मकान बनाते हैं, बल्कि उसमें अन्य सामान भी रखा जाता है।
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मान्यता है कि ऐसा करने से अगले जन्म में उन्हें गृहस्थ जीवन की तमाम सुविधाएं मिलती हैं। मुक्तिधाम की यात्रा के नाम से प्रसिद्ध पवित्र मणिमहेश यात्रा के दौरान श्रद्धालु धनछौ से लेकर गौरीकुंड के बीच विभिन्न पड़ावों पर इस परंपरा को सदियों से निभाते आ रहे हैं।
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मणिमहेश यात्रा के दौरान धनछौ से लेकर गौरीकुंड के मध्य बांदर घाटी, सुंदरासी, भैरों घाटी और गौरीकुंड पड़ाव आते हैं। जम्मू-कश्मीर से आने वाले भद्रवाही श्रद्धालु और प्रदेश के शिवभक्त छोटे-छोटे पत्थरों से यहां मकान बनाते हैं।
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श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्ची श्रद्धा, विश्वास और लगन से यात्रा पर आने वाले भक्तों की हर आशा को भोलेनाथ अवश्य पूरा करते हैं। भद्रवाह से आए प्रहलाद, विवेक, बलवंत, प्रीतम, जीवन, सुलोचना, कांतो, कौशल्या और सीमा ने बताया कि जब वे यात्रा पर निकले थे तो माता-पिता और रिश्तेदारों ने यात्रा के दौरान पत्थर के मकान बनाने की सलाह दी थी।
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उनसे कहा गया कि वे यात्रा के दौरान सुंदरासी से लेकर गौरीकुंड के बीच पड़ने वाले पड़ावों में छोटे-छोटे पत्थरों के मकान बनाएं। पंडित लक्ष्मण दत्त शर्मा और पंडित विपन शर्मा ने बताया कि धनछौ से गौरीकुंड के मध्य बांदर घाटी, सुंदरासी, भैरों घाटी और गौरीकुंड के बीच भक्त पत्थरों के छोटे-छोटे मकान बनाते हैं।