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Shimla News: बीमा कंपनी की याचिका खारिज देना, होगा 1.23 लाख मुआवजा

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राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का फैसला
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एपीजी यूनिवर्सिटी के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी कार
रुचि सांख्यान
शिमला। राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी की अपील को खारिज कर जिला उपभोक्ता आयोग के फैसले को बरकरार रखा है। कंपनी को अब जिला उपभोक्ता आयोग द्वारा तय 1.23 लाख रुपये का मुआवजा उपभोक्ता को
देना होगा।

राज्य आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति इंद्र सिंह मेहता और सदस्य प्रताप सिंह ठाकुर की पीठ ने स्पष्ट किया कि वाहन मालिक द्वारा किसी रिश्तेदार या परिचित को गाड़ी की चाबी सौंपने का यह अर्थ कतई नहीं निकाला जा सकता कि उसने शराब पीकर वाहन चलाने की सहमति दी थी। इसके साथ ही आयोग ने व्यवस्था दी कि एमएलसी जारी करने वाले चिकित्सा अधिकारी और सैंपल ले जाने वाले पुलिस कर्मियों के हलफनामे के अभाव में एमएलसी या एफएसएल रिपोर्ट को पुख्ता साक्ष्य नहीं माना जा सकता। शिमला निवासी अशोक कुमार शांडिल की कार नेशनल इंश्योरेंस कंपनी से बीमित थी। इनके भाई कपिल शांडिल विकासनगर से घरेलू सामान लाने के लिए कार मांगकर ले गए थे।
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एपीजी यूनिवर्सिटी के पास कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई जिससे वाहन को भारी क्षति पहुंची। मामले में पुलिस थाना छोटा शिमला में प्राथमिकी दर्ज की गई थी। कार मालिक ने जब बीमा क्लेम पेश किया तो बीमा कंपनी ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चालक शराब के नशे में था जो पॉलिसी की शर्तों का उल्लंघन है। कंपनी ने जुन्गा स्थित फॉरेंसिक लैब और एमएलसी रिपोर्ट का हवाला दिया। इसके खिलाफ पीड़ित ने जिला उपभोक्ता आयोग शिमला का दरवाजा खटखटाया। जिला आयोग ने क्लेम को सही ठहराते हुए सर्वेयर द्वारा आकलित 1.23 लाख रुपये का नुकसान तथा मुआवजा देने का आदेश दिया था। जिला आयोग के इसी फैसले को बीमा कंपनी ने राज्य आयोग में चुनौती दी थी।
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आयोग की टिप्पणी
आयोग ने रिकॉर्ड का अवलोकन कर पाया कि कार चालक कपिल शांडिल को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 और आईपीसी के आरोपों से पहले ही बरी कर दिया था। ऐसे में पुलिस रिपोर्ट के आधार पर लगाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं किया जा सकता। वाहन मालिक ने शपथपत्र में स्पष्ट किया था कि चालक ने उसकी जानकारी या सहमति से शराब का सेवन नहीं किया था। आयोग ने कहा कि एमएलसी और रासायनिक परीक्षण रिपोर्ट तब तक ठोस साक्ष्य नहीं बनती जब तक संबंधित डॉक्टर और सैंपल ले जाने वाले पुलिस कर्मियों के शपथपत्र रिकॉर्ड पर न हों।
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