भारत और चीन के बीच सीमा को लेकर दशकों से चल रहे विवाद का कारण बनी मैकमोहन रेखा का खाका शिमला में ही खींचा गया था। वर्ष 1913-14 में ब्रिटेन और तिब्बत के बीच सीमा निर्धारण के लिए शिमला कन्वेंशन हुआ था। इसका आयोजन अक्तूबर 1913 से जुलाई 1914 के बीच किया गया था। सम्मेलन के मुख्य वार्ताकार तत्कालीन भारतीय साम्राज्य में ब्रिटेन के विदेश सचिव सर हैनरी मैकमोहन थे, जिनके नाम पर रेखा को मैकमोहन रेखा कहते हैं।
माना जाता है कि शिमला कन्वेंशन का आयोजन पंजाब सरकार के अतिथि गृह सिडार हाउस में हुआ था। मैकमोहन लाइन का कुछ ड्राफ्ट वर्क ऐतिहासिक यूनाइटेड सर्विस क्लब (यूएस क्लब) शिमला के भवन में भी किया गया था। हिमाचल पर्यटन विभाग की किताब ‘हर घर कुछ कहता है’ में भी इसका जिक्र है। शिमला विवि इक्डोल में इतिहास विभाग के सहायक प्रोफेसर अंकुश भारद्वाज ने बताया कि शिमला कन्वेंशन में ब्रिटेन से सर हैनरी मैकमोहन, चीन के प्रतिनिधि कमिश्नर इवान चिन और तिब्बत से लोनचेन शातरा मौजूद थे। 1935 में भारत के सर्वे ऑफ इंडिया के मैप में मैकमोहन लाइन को एक आधिकारिक रूप से प्रकाशित किया है।
शुरू से ही विवादित रही इस रेखा को लेकर 1950 में विवाद बढ़ गया। इसी वजह से वर्ष 1962 में भारत चीन का युद्ध भी हुआ। इतिहासकारों का कहना है कि चीन मैकमोहन रेखा को यह कहकर मानने से इंकार करता है कि तिब्बत कभी स्वतंत्र देश नहीं था। शिमला कन्वेंशन में उसकी स्वीकृति के बगैर तिब्बत के प्रतिनिधि और ब्रिटिश प्रतिनिधि ने इसे स्वरूप दिया जिसे चीन नहीं मानता। यही वजह है कि मैकमोहन रेखा को लेकर आज भी भारत और चीन के बीच गलवां घाटी जैसी हिंसक घटनाएं हुई हैं।