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HP High Court: मूकदर्शक मुकदमेबाजी की प्रक्रिया पूरी होने पर नहीं रखते पुनर्विचार याचिका दायर करने का हक

Sat, 03 Jun 2023 11:23 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला

सार

 न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ और न्यायाधीश सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि निष्पक्षता प्रत्येक न्यायिक प्रक्रिया की पहचान होनी चाहिए। यह न केवल अदालतों पर लागू होता है बल्कि, मुकदमेबाजी पक्षों पर भी लागू होता है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पुनर्विचार याचिका दायर करने के मामले में अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने कहा कि मूकदर्शक मुकदमेबाजी की प्रक्रिया पूरी होने पर पुनर्विचार याचिका दायर करने का हक नहीं रखते। न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ और न्यायाधीश सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि निष्पक्षता प्रत्येक न्यायिक प्रक्रिया की पहचान होनी चाहिए। यह न केवल अदालतों पर लागू होता है बल्कि, मुकदमेबाजी पक्षों पर भी लागू होता है। मुकदमेबाजी को लुका-छिपी के खेल के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने वन रक्षक बंदना कुमारी और अन्य की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका को खारिज करते हुए यह निर्णय सुनाया।

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अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता वन रक्षकों की वरीयता के संबंध में लंबित याचिका के दौरान मूकदर्शक बने रहे और मुकदमेबाजी की प्रक्रिया पूरी होने पर अदालत के निर्णय पर हस्तक्षेप करने की गुहार लगाने लगे। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता वन रक्षकों की वरीयता के संबंध में लंबित याचिका, इसके निर्णय, खंडपीठ के समक्ष दायर अपील और 9 सितंबर 2022 को पारित अंतरिम आदेशों से भली-भांति अवगत थे। उस समय वे दर्शक बनकर मुकदमेबाजी की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार करते रहे। जब उनके खिलाफ निर्णय पारित किया गया तो वे अदालत के समक्ष चुनौती देने आ गए, जोकि पुनर्विचार याचिका दायर करने के लिए काफी नहीं है।

बता दें कि वर्ष 2007 में नियुक्त हुए वन रक्षकों की वर्ष 2019 तक वरिष्ठता सूची नियुक्ति की तिथि के आधार पर जारी की जाती रही है जोकि भर्ती एवं पदोन्नति नियम 1978 के मुताबिक सही थी। वरिष्ठता सूची को आज तक कभी भी चुनौती नहीं दी गई थी। वन विभाग में 1978 से 2019 तक जितनी भी पदोन्नतियां हुईं वे सभी नियम भर्ती एवं पदोन्नति नियम 1978 के मुताबिक हुई हैं। लेकिन, वर्ष 2019 में 08-08-2019 को प्रधान मुख्य अरण्यपाल ने इस वरिष्ठता सूची व भर्ती एवं पदोन्नति नियम 1978 के नियमों को दरकिनार करते हुए मेरिट के आधार पर वरिष्ठता का मनमाना फैसला जारी किया। इस फैसले को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई।
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वर्ष 2022 में एकल पीठ ने विभाग के इस निर्णय को सही करार देते हुए कायम रखा और विभाग ने हाईकोर्ट के निर्णय के मुताबिक 15 दिन के भीतर मेरिट के आधार पर पदोन्नति दे दी। एकलपीठ के निर्णय को वन रक्षक संदीप, योगेश, इंतजार, सतीश सहित अन्य वन रक्षकों ने खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की। खंडपीठ ने 23 मार्च 2023 को एकल पीठ के फैसले को निरस्त किया और मेरिट के आधार पर पदोन्नत हुए वन रक्षकों की पदोन्नति को भी निरस्त दिया। खंडपीठ ने वन रक्षकों की पदोन्नतियां उनकी नियुक्ति की तिथि के आधार पर किए जाने का निर्णय सुनाया था। खंडपीठ के इस निर्णय पर दोबारा विचार करने के लिए याचिकाकर्ताओं ने पुनर्विचार याचिका दायर की थी। अदालत ने इस याचिका को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया।

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न्यायिक कार्यवाही करने वाले अधिकारियों को प्रशिक्षण दे सरकार : हाईकोर्ट

 हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही के रिकॉर्ड का उचित रखरखाव न रखने पर कड़ा संज्ञान लिया है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने मुख्य सचिव को आदेश दिए हैं कि वह न्यायिक कार्यवाही करने वाले अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के लिए उचित कदम उठाएं। अदालत ने नाबालिग के अभिभावकता से जुड़े मामले में पाया कि दंडाधिकारी की अदालत में न्यायिक कार्यवाही के रिकॉर्ड का उचित रखरखाव नहीं रखा था। दिन-प्रतिदिन की कार्यवाही को दर्ज नहीं किया गया है और रिकॉर्ड को एक आम आदमी की तरह रखा गया है। अदालत ने कहा कि न्यायिक कार्यवाही करने वाले अधिकारियों को प्रशिक्षण देने की जरूरत है। अदालत ने मुख्य सचिव को आदेश दिए कि वह न्यायिक अकादमी में ऐसे अधिकारियों को प्रशिक्षण देने कि लिए उचित कदम उठाएं। नाबालिग के अभिभावकता से जुड़े मामले में दंडाधिकारी की अदालत ने मां को ही नाबालिग का अभिभावक पाया था और नाबालिग को पेश करने के आदेश दिए थे। प्रीति देवी का विवाह जिला सोलन की तहसील रामशहर के बहलम गांव के अमर सिंह के साथ हुआ था।

पति-पत्नी के साथ-साथ परिवार के अन्य सदस्यों के बीच होने वाले झगड़ों के कारण प्रीति देवी और उसका पति अमर सिंह अपने दो नाबालिग बेटों के साथ नालागढ़ में अलग रह रहे थे। 17 जुलाई 2022 को अमर सिंह ने आत्महत्या कर ली। मृतक अमर सिंह के पिता दर्शन सिंह ने प्रीति देवी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। पुलिस ने 18 जुलाई 2022 को प्रीति देवी को गिरफ्तार कर लिया और बाद में उसे जमानत पर रिहा कर दिया गया। जमानत पर रिहा होने के बाद प्रीति देवी ने अपने बच्चों की कस्टडी के लिए एसडीएम नालागढ़ की अदालत में अर्जी दाखिल की। एसडीएम नालागढ़ ने दादा-दादी को नाबालिग बच्चों की कस्टडी मां प्रीति देवी को सौंपने का निर्देश दिया। डीडीएम नालागढ़ के इस आदेश के खिलाफ दादा-दादी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। दलील दी गई कि प्रीति देवी के अपने पति के साथ अच्छे संबंध नहीं थे। ऐसे में मां के हाथों में बच्चों का जीवन सुरक्षित नहीं रहेगा। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि हालांकि, बच्चों की अभिरक्षा (कस्टडी) पर मां का पूरा अधिकार नहीं है। बच्चों का कल्याण उसकी अभिभावकता को तय करता है। यदि मां बच्चे के कल्याण के लिए अक्षम या अयोग्य है तो वह अभिभावक का हक खो देगी और बच्चे के कल्याण करने वाला ही उसका अभिभावक होगा। इसके लिए मां को उचित कार्यवाही में बच्चे के कल्याण के लिए अयोग्य घोषित किया जाना जरूरी है।
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