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हाईकोर्ट के आदेश, एफआईआर में न लिखे जाएं जातिसूचक शब्द

Sat, 17 Sep 2016 12:04 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
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हिमाचल हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को आदेश दिए हैं कि वह आपराधिक मामलों में दर्ज होने वाली एफआईआर में जातिसूचक शब्दों को लिखना तुरंत प्रभाव से बंद करे। न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायाधीश सुरेश्वर ठाकुर की खंडपीठ ने फैसले में कहा कि भारतीय संविधान के निर्माताओं की यह सोच थी कि जातिवाद बंद होना चाहिए।
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लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य है कि जातिवाद अभी तक बरकरार है। जातिवाद के पीछे कोई भी वैज्ञानिक, तार्किक, बौद्धिक व सामाजिक आधार नहीं है। यह हमारे संविधान के मूलभूत आधार के विपरीत है। कोर्ट ने पाया कि जब भी किसी आरोपी के खिलाफ  आपराधिक मामला दर्ज होता है तो उसकी जाति को विशेषतौर पर लिखा जाता है।

यही नहीं शिकायतकर्ता की जाति भी दर्ज की जाती है। कोर्ट ने इसे गैरकानूनी करार दिया। कोर्ट ने कहा कि समाज में इज्जत और गरिमा से जीना हर व्यक्ति का अधिकार है। हमारा संविधान गैर जाति समाज की गारंटी देता है। सरकार का यह दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि प्रत्येक व्यक्ति समाज में गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हों।
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बयान दर्ज करते वक्त भी जाति लिखना गलत

फैसले के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने पुलिस की ओर से सीआरपीसी के धारा 154 के तहत बयान दर्ज करते समय भी जाति लिखने को गलत ठहराया। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को उप निवेशीय परंपरा बताया। साथ ही इसे भारतीय संविधान के खिलाफ बताते हुए कहा कि तुरंत प्रभाव से इस व्यवस्था को खत्म करने को कहा।

प्रधान सचिव को दिए निर्देश
हाईकोर्ट ने प्रधान सचिव गृह को आदेश जारी किए हैं कि प्रदेश के सभी जांच अधिकारियों को वादी, प्रतिवादी और गवाह की जाति का उल्लेख न करने के निर्देश जारी करने को कहा। साथ ही कहा कि रिकवरी मेमो, एफआईआर, जब्त करने की कार्रवाई, मरने से पहले के बयान में भी जाति का उल्लेख न किया जाए।

नशा रखने के दोषी को 20 साल का कठोर कारावास भुगतना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल हाईकोर्ट की डेढ़ किलो अफीम और 5 किलो भांग के साथ पकड़े दोषी बुधराम को मादक पदार्थ निरोधक अधिनियम के तहत सुनाई 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा को सही ठहराया है। हाईकोर्ट के न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर के फैसले को सही ठहराते हुए सुप्रीमकोर्ट ने दोषी बुधराम की अपील को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने 7 जुलाई को विशेष न्यायाधीश फास्ट ट्रैक मंडी के फैसले को पलटते हुए दोषी को 20 साल के लिए जेल भेजा था। मामले के अनुसार 7 जनवरी, 2010 को पुलिस ने सदर मंडी में पेट्रोलिंग और नाकेबंदी के दौरान बुधराम को 1500 ग्राम अफीम के साथ गिरफ्तार किया था।
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हिमाचल हाईकोर्ट के फैसले पर मुहर

मादक पदार्थों से जुड़े एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल हाईकोर्ट की सुनील कुमार को सुनाई 5 वर्ष की कैद की सजा को भी बरकरार रखा। मामले में हाईकोर्ट ने 250 ग्राम चरस के साथ पकड़े दोषी सुनील कुमार को 5 वर्ष कठोर कारावास तथा 25 हजार जुर्माने की सजा सुनाई थी। न्यायाधीश राजीव शर्मा और न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने विशेष न्यायाधीश सोलन के फैसले को पलटते हुए यह सजा सुनाई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सुनील कुमार की ओर से दायर एसएलपी को खारिज कर दिया। 5 नवंबर, 2007 को नालागढ़ बाजार में दोषी सुनील कुमार को 250 ग्राम चरस के साथ गिरफ्तार किया गया था। उस समय उसकी उम्र महज 20 साल थी। उसे अपराध करने के 9 वर्षों बाद हाईकोर्ट से यह सजा मिली थी।
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