हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सड़क बनाने के लिए निजी भूमि का इस्तेमाल करने में अहम व्यवस्था दी है। अदालत ने कहा कि संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, फिर भी अनुच्छेद 300-ए के तहत यह एक सांविधानिक अधिकार है। इस दृष्टिकोण से अनुच्छेद 300-ए के तहत किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है। मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव और न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने यह निर्णय सुनाया। अदालत ने बिलासपुर निवासी लक्षमण सिंह की याचिका को खारिज करते हुए कहा कि कोई भी अधिकारी या ग्रामवासी प्रतिवादी को सड़क बनाने के लिए अपनी जमीन देने के लिए बाध्य नहीं कर सकता है। बिलासपुर जिले में बनने वाली अपर भगेड़ से कल्लर सारटी सड़क निर्माण में बाधा पहुंचाने को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई थी।
अदालत को बताया गया कि राज्य सरकार ने प्रदेश में संपर्क मार्ग और एंबुलेंस मार्ग निर्माण का निर्णय लिया था। बिलासपुर जिला की 10 सड़कों में से इस सड़क का निर्माण प्रस्तावित किया गया था। राज्य सरकार ने इस सड़क के निर्माण के लिए 34.6 लाख रुपये इस शर्त के साथ स्वीकृत किए थे कि स्थानीय लोगों को मुफ्त में जमीन देनी होगी। सभी ग्राम वासियों ने अपनी भूमि लोक निर्माण विभाग के नाम कर दी। प्रतिवादी ने भी अपनी जमीन लोनिवि के नाम कर दी थी। लेकिन सड़क का निर्माण उस जमीन पर नहीं किया गया। जिस जमीन से सड़क निकाली गई, उसे प्रतिवादी ने दान नहीं किया था। इसकी वजह से प्रतिवादी ने सड़क निर्माण में बाधा डाल दी। अदालत ने पुलिस विभाग, उपायुक्त और उपमंडलाधिकारी नागरिक की रिपोर्ट का अवलोकन पर पाया कि याचिकाकर्ता बिना किसी अधिकार के प्रतिवादी की भूमि को सड़क बनाने के लिए इस्तेमाल करना चाहता है। अदालत ने याचिका को निराधार करार देते हुए खारिज कर दिया।
एनएचएआई की ओर से मुआवजा अदा नहीं करने पर हाईकोर्ट सख्त
प्रदेश हाईकोर्ट ने एनएचएआई की ओर से मुआवजा अदा नहीं करने पर कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को एक सप्ताह के भीतर 3.19 करोड़ रुपये अदा करने के आदेश दिए हैं। एमएस रामचंद्र राव व न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की खंडपीठ ने इस मामले में अब अगली सुनवाई 25 जुलाई को निर्धारित की है। पिंजौर-बद्दी- नालागढ़-स्वारघाट सड़क को चौड़ा करने के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने याचिकाकर्ता भाग सिंह और अन्य की 12.6 बीघा जमीन का अधिग्रहण किया था। 23 मार्च 2019 को सक्षम अधिकारी ने याचिकाकर्ता की भूमि का मुआवजा 3.19 करोड़ रुपये आंका था। 6 जनवरी 2020 को भूमि लोक निर्माण विभाग के नाम कर दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं ने मुआवजे की राशि का भुगतान करने के लिए आवेदन दायर किया। याचिकाकर्ताओं को बताया गया कि उनके मुआवजे का भुगतान नहीं किया जा सकता है। अभी तक राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की ओर से मुआवजे की राशि को जमा नहीं करवाया गया है। 2 मार्च 2022 को याचिकाकर्ताओं ने मुआवजा पाने के लिए प्रतिवेदन किया था। इसके बावजूद भी मुआवजा राशि का भुगतान नहीं किया गया। याचिकाकर्ता ने अदालत के बताया कि उन्हें लगभग 3.19 करोड़ रुपये का भुगतान किया जाना है।
बता दें कि एक अन्य मामले में मुआवजा अदा न करने के मामले में हाईकोर्ट ने अहम व्यवस्था दी थी। अदालत ने कहा था कि हालांकि, संपत्ति का अधिकार एक मौलिक अधिकार है, फिर भी अनुच्छेद 300-ए के तहत यह एक सांविधानिक अधिकार है। इस दृष्टिकोण से अनुच्छेद 300-ए के तहत किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता है। यद्यपि राज्य के पास जनता की भलाई के लिए भूमि के मालिक की संपत्ति को लेने की शक्ति है, लेकिन सरकार इसकी क्षति की भरपाई करने के लिए बाध्य है।