हिमाचल प्रदेश में सीपीएस तैनात करने का प्रावधान और परंपरा दोनों ही है। मुख्य संसदीय सचिवों को महकमे देकर सरकार उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करती है, लेकिन यह औपचारिकता भर ही रहता है। मंत्री की मर्जी के बिना सीपीएस को कोई फाइल नहीं जाती।
विभागीय निर्णयों में भी उनकी राय तक नहीं ली जाती, लेकिन बैठकों में वे उपस्थिति रहते हैं। अलग से कक्ष और वाहन सुविधा के अलावा उनकी तैनाती का सरकार कोई खास फायदा भी नहीं होता।
मंत्रिमंडल से बाहर रहने वाले वरिष्ठ विधायकों को सरकारें सीपीएस की जिम्मेदारी देती रही हैं। ऐसे में कुछ मंत्री उनके विभागों के सीपीएस बनाने के पक्ष में नहीं हैं। हालांकि जीते विधायकों में से कई सीपीएस का ओहदा मिलने की आस लगाए हुए हैं।
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर नेे कहा कि सरकार ने संगठन के साथ विचारविमर्श के बाद कई पदों पर नाम तय कर लिए गए हैं। एक दो दिन के भीतर तैनातियां कर ली जाएंगी। हिमाचल में सीपीएस के लिए 9 पदों का प्रावधान है, लेकिन तैनाती को लेकर चल रहे कानूनी विवाद पर निर्णय आने का इंतजार सरकार कर रही है।
अन्य राज्यों के मुकाबले हमारी स्थिति अलग है, बावजूद इसके सरकार तैनाती पर कानूनी सलाह भी ले रही है। अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। कानूनी सलाह मिलने के बाद इसके बाद पार्टी के नेताओं के साथ भी मशवरा करेंगे, फिर कोई फैसला करेंगे।
दर्जाधारियों पर फैसला होगा जल्द
सरकार की ओर निगम और बोर्डों अध्यक्ष एवं उपाध्यक्षों के अलावा सहकारी बैंकों के चेयरमैन बनाने की प्रक्रिया विचाराधीन हैं। कुछ विधायकों और पूर्व विधायकों को इन पदों पर एडजस्ट किया जाना है।