जुर्म करने वालों को सजा देते हुए पीड़ित के अधिकारों को नहीं भूलना चाहिए। पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करते हुए जज को अपराधी की सजा निर्धारित करनी चाहिए। ये शब्द प्रदेश हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर ने एक दिवसीय कांफ्रेंस का उद्घाटन करते हुए कहे। न्यायमूर्ति मीर ने कहा कि दंड प्रक्रिया में भी पीड़ित को मुआवजा देने का प्रावधान है।
उन्होंने कहा कि पीड़ित को यह भी अधिकार है कि वह अपराधी को कम सजा दिए जाने के फैसले को अपील के माध्यम से चुनौती दे सकता है। हिमाचल प्रदेश ज्यूडिशल अकेडमी द्वारा आयोजित इस कांफ्रें स में अकेडमी के पैट्रन-इन-चीफ न्यायाधीश राजीव शर्मा ने कहा कि अपराधियों की सजा का निर्धारण कानून सम्मत होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि अपराधियों की सजा का निर्धारण जज की स्वेच्छा से नहीं, बल्कि कानूननसम्मत होना चाहिए, जिसे कि अधिकतर बहुत कम महत्व दिया जाता है। उन्होंने कहा कि अपराधियों को सजा देना सिर्फ ट्रायल को खत्म करना नहीं है, बल्कि पीड़ित को भी अहसास होना चाहिए कि अपराधी को उचित सजा मिली है।
इस एक दिवसीय कार्यशाला में न्यायाधीश धरमचंद चौधरी, न्यायाधीश त्रिलोक चौहान, न्यायाधीश पीएस राणा, न्यायाधीश सुरेश्वर ठाकुर और लगभग 110 न्यायिक अधिकारियों ने भाग लिया। दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफे सर एससी रैना, पंजाब यूनिवर्सिटी के भूतपूर्व डीन प्रोफे सर गुरपाल सिंह, एपीजी यूनिवर्सिटी की निदेशक प्रोफेसर त्रिशा शर्मा, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, रजिस्ट्रार जनरल, अन्य रजिस्ट्रार और ज्यूडिशल अकेडमी के निदेशक राकेश कैं थला और उपनिदेशक अनुजा सूद उपस्थित थे।