शहर के समरहिल वार्ड के शिव बावड़ी में वर्ष 2023 में हुए भारी भूस्खलन में हुई थी 20 लोगों की मौत आपदा के करीब ढाई साल बाद यहां धंसा है डंगा हर्षित शर्मा शिमला। राजधानी के समरहिल वार्ड के शिव बावड़ी क्षेत्र में बार-बार जमीन धंस रही है। इस क्षेत्र में पूरी पहाड़ी पर आखिर क्यों धंसाव हो रहा है, इसका पता लगाने के लिए अब हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शोध करेगा। पता लगाया जाएगा कि जमीन अस्थिर क्यों हो रही है।
विश्वविद्यालय पहले भी एक वैज्ञानिक अध्ययन कर चुका है। इसमें भी कारणों का पता लगाने का प्रयास किया था। हाल ही में बालूगंज–समरहिल मार्ग पर ठीक उसी स्थान पर मलबा गिरने की घटना दर्ज हुई है जहां 14 अगस्त 2023 को शिव बावड़ी भूस्खलन हुआ था। इस हादसे में 20 लोगों की मौत हो गई थी। सड़क के साथ कालका–शिमला रेलवे ट्रैक को भी नुकसान पहुंचा था। ताजा घटना ने एक बार फिर इस पूरे क्षेत्र की संवेदनशीलता को सामने ला दिया है। वर्ष 2023 की घटना पर किए वैज्ञानिक अध्ययन में पाया था कि अत्यधिक वर्षा के बाद पहाड़ी के भीतर पानी जमा हो गया था। इस जमा पानी के दबाव से यहां भूस्खलन हुआ था।
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हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और सीएसआईआर रुड़की के वैज्ञानिकों ने फील्ड जांच, ईनसार विश्लेषण, ड्रोन मैपिंग और पोर वाटर प्रेशर सिमुलेशन के आधार पर पाया कि लगातार बारिश से ढलान के भीतर पानी भर गया था। इससे पॉजिटिव पोर वाटर प्रेशर बना और ढलान के अंदर परच्ड एक्वीफर विकसित हुए जिससे मिट्टी और चट्टानों की पकड़ कमजोर हो गई। भूस्खलन लगभग 7.52 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला था और करीब 37 हजार घन मीटर मलबा नीचे आया था। मलबे की अधिकतम गति लगभग 9.27 मीटर प्रति सेकंड दर्ज की गई, जिससे भारी नुकसान हुआ। ईनसार टाइम-सीरीज विश्लेषण में घटना से पहले जमीन के भीतर हलचल के संकेत भी दर्ज किए थे। हालिया घटना में भी उसी ढलान क्षेत्र से मलबा गिरा जहां हादसे के बाद करोड़ों की लागत से रिटेनिंग वॉल बनाई थी। बारिश के बाद सड़क पर मलबा आने से कुछ समय के लिए यातायात प्रभावित हुआ था। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर डिजास्टर स्टडीज के महेश शर्मा ने बताया कि इस क्षेत्र पर नया अध्ययन शुरू किया है। टीम मौजूदा भू-स्थितियों, वर्षा के प्रभाव और ढलान की स्थिरता का आकलन कर रही है।
भूजल दबाव और ढलान की कमजोरी है खतरा वैज्ञानिक अध्ययन में यह स्पष्ट किया था कि शिव बावड़ी भूस्खलन एक रेनफॉल-इंड्यूस्ड लैंडस्लाइड था जिसमें लगातार और तीव्र वर्षा के कारण पहाड़ी के भीतर पानी का दबाव बढ़ गया था। इस दबाव को पोर वाटर प्रेशर कहा जाता है, जो मिट्टी और चट्टानों के बीच पकड़ को कमजोर करता है। रिपोर्ट के अनुसार लगातार वर्षा से ढलान के भीतर पाच्र्ड एक्वीफर बने (क्षेत्रीय जलस्तर)। इससे ढलान संतृप्त हो गया और उसकी स्थिरता कम हो गई। घटना वाले दिन हुई भारी बारिश ने स्थिति बिगड़ी और मलबा तेज गति से नीचे आया। वैज्ञानिकों ने यह भी दर्ज किया था कि इस तरह की स्थिति दोबारा बन सकती है खासकर लगातार वर्षा के दौरान।