यह छात्रवृत्ति योजना प्रदेश के सभी जनजातीय क्षेत्रों लाहौल-स्पीति, किन्नौर सहित अन्य अधिसूचित जनजातीय इलाकों में स्थित सभी सरकारी स्कूलों में लागू है। योजना का लाभ केवल उन्हीं विद्यार्थियों को मिलता है जो किसी अन्य छात्रवृत्ति योजना का लाभ न ले रहे हों। शिक्षा विभाग का तर्क है कि यह एक पारंपरिक सहायता योजना है, जो वर्षों से चली आ रही है। इस महंगाई के दौर में 80 रुपये सालाना की छात्रवृत्ति सिर्फ कागजी औपचारिकता बनकर रह गई है। एक कॉपी और पेंसिल तक की कीमत इससे कहीं अधिक है, ऐसे में इस राशि से छात्र की शैक्षणिक जरूरतों को पूरा करना असंभव है। सरकार से अपेक्षा थी कि छात्रवृत्ति राशि को समय के साथ बढ़ाया जाएगा, लेकिन वर्षों से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ।
स्मार्ट क्लासरूम बनाम जमीनी सच्चाई
ज्ञान विज्ञान समिति के पदाधिकारी जिया नंद शर्मा का कहना है कि राज्य सरकार एक ओर स्मार्ट क्लासरूम, टैबलेट वितरण और एआई आधारित पढ़ाई को बढ़ावा देने की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर जनजातीय छात्रों के लिए बुनियादी आर्थिक सहायता भी बेहद सीमित है। डिजिटल शिक्षा की चमक-दमक के बीच समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग के विद्यार्थियों की वास्तविक जरूरतें ऐसे में नजरअंदाज हो रही हैं। छात्रवृत्ति योजना की राशि और ढांचे की पुन: समीक्षा होनी चाहिए।