महिलाओं के वास्तविक सशक्तीकरण के लिए उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना अनिवार्य: कोर्ट
खंडपीठ ने पेंशन नियमों की केवल तकनीकी व्याख्या करने के रुख पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि जब मामला पेंशन जैसे सामाजिक कल्याणकारी लाभों का हो, तो प्राधिकारियों और अदालतों को एक संवेदनशील और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। महिलाओं के वास्तविक सशक्तीकरण के लिए उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना अनिवार्य है। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत भले ही पहली पत्नी के रहते किया गया दूसरा विवाह कानूनी तौर पर शून्य या अवैध हो सकता है, लेकिन इसे अनैतिक नहीं कहा जा सकता।
पारिवारिक पेंशन का मुख्य मकसद किसी लाचार महिला को बेसहारा होने से बचाना
अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि फैमिली पेंशन प्रदान करने का उद्देश्य समाज के आर्थिक रूप से कमजोर और आश्रित व्यक्ति को गुजारा भत्ता देने के उद्देश्य से अलग नहीं हो सकता। इसका मुख्य मकसद किसी लाचार महिला को बेसहारा होने से बचाना है। अदालत ने माना कि यदि दो पक्ष लंबे समय तक एक साथ पति-पत्नी की तरह रहते हैं, तो कानूनन उनके विवाह की वैधता के पक्ष में एक मजबूत अनुमान बनता है।
सरकार ने एकल जज के फैसले को दी थी चुनाैति
अदालत ने माना कि यदि दो पक्ष लंबे समय तक एक साथ पति-पत्नी की तरह रहते हैं,तो कानूनन उनके विवाह की वैधता के पक्ष में एक मजबूत अनुमान बनता है। इस मामले में, दूसरी शादी से पैदा हुए बच्चे भी अब वयस्क हो चुके थे और पहली पत्नी से कोई संतान नहीं थी,जिससे किसी अन्य पक्ष के अधिकारों का हनन नहीं हो रहा था। गौरतलब है कि राज्य सरकार ने एकल जज के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उर्मिला देवी के पक्ष में पेंशन जारी करने का आदेश था।
तय समय में बकाया नहीं चुकाने पर छह फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देना होगा
इसके साथ ही तय समय सीमा के भीतर बकाया न देने पर सरकार को छह फीसदी प्रति वर्ष की दर से ब्याज भी देना होगा। सरकार का तर्क था कि कर्मचारी की दूसरी शादी वर्ष 1987 में उसकी पहली पत्नी (रेशमू देवी) के जीवित रहते हुए हुई थी। इसलिए, केंद्रीय सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972 के तहत इस दूसरी शादी को मान्यता नहीं दी जा सकती और उनका आवेदन खारिज किया जाना जायज था।