हिमाचल प्रदेश के लोगों का आयुष पद्धति और चिकित्सा प्रणालियों पर भरोसा बढ़ा है। प्रदेश में 57.2 फीसदी लोग आयुष पद्धतियों और दवाओं का प्रयोग कर रहे हैं। खास बात यह है कि अखिल भारतीय आयुष सर्वेक्षण और अध्ययन के अनुसार देशभर की औसत के अनुसार प्रदेश शीर्ष स्थान पर है। देश में औसतन 28.4 फीसदी परिवार ही बीमारियों के उपचार और रोकथाम के लिए आयुष पद्धतियों का उपयोग करते हैं लेकिन हिमाचल प्रदेश कहीं आगे है।
ऐसा आयुष स्वास्थ्य केंद्रों, पंचकर्म तकनीशियन पाठ्यक्रमों, पद्धतियां और थेरेपी जैसी सुविधाओं का तेजी से विस्तार होने से संभव हो सका है। महाराष्ट्र, दिल्ली, असम, उत्तर प्रदेश, केरल, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश अन्य राज्य हाई रेंज में आते हैं। यहां पर पांच फीसदी हाउस होल्ड ही आयुष की ओर ध्यान दे रहे हैं।
मिडल रेंज 22.8% से 34.1% के बीच भी दस, सबसे कम 5 फीसदी से 22.7 फीसदी श्रेणी में 15 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश शामिल हैं। 79वें अखिल भारतीय आयुष सर्वेक्षण में देश भर के 1,81,298 परिवारों से जानकारी ली गई। इसमें 1,04,195 ग्रामीण और 77,103 शहरी क्षेत्र के लोगों से आयुष पद्धतियों का प्रयोग करने के बारे में पूछा गया।
यह सर्वेक्षण वर्ष 2022-23 में किया गया जिसे हाल ही में सार्वजनिक किया है। सामने आया कि देशभर में लगभग 95 फीसदी लोग आयुष प्रणालियों के बारे में जानते हैं। बीमारियों से बचाव तथा कायाकल्प के लिए बड़े पैमाने पर इन पद्धतियों का उपयोग कर रहे हैं।
इस कारण लोगों को ज्यादा विश्वास
हिमाचल प्रदेश को आयुर्वेद की भूमि माना जाता है। यहां की संस्कृति में प्राकृतिक चिकित्सा का गहरा महत्व है। आयुष पद्धतियां आम जनता के लिए आर्थिक रूप से काफी किफायती और सुलभ हैं। प्राकृतिक पद्धतियों और औषधियों से दुष्प्रभाव नहीं होते। इससे लोग पुरानी बीमारियों के इलाज में इन्हें प्राथमिकता देते हैं। हिमालयी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के औषधीय पौधे और जड़ी-बूटियां प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं, जिससे इनका चलन सहज है। इन कारणों से लोगों में आयुर्वेद पर ज्यादा विश्वास है।