भले ही सरकार ने कैंची और आरी खरीद के कथित घोटाले में पूर्व मंत्री को क्लीन चिट देने की तैयारी कर ली हो, लेकिन अब इसमें अफसर फंसेंगे। 12 साल पुरानी जांच एकदम बंद करने के लिए अभियोजन अधिकारी अभी तैयार नहीं हैं। मामले में गंभीर अनियमितताओं के आरोप लगा रहे हैं। यह मामला वीरभद्र सरकार के कार्यकाल का है। धूमल सरकार ने जांच शुरू की थी।
धूमल सरकार में मामले में पूर्व बागवानी मंत्री सिंघी राम को लपेटने की तैयारी थी, मगर इसमें सीधे तौर पर साक्ष्य नहीं मिले थे। सरकार बदलने पर वीरभद्र सरकार ने भी जांच जारी रखी। जयराम सरकार के सत्ता में आने पर कथित घोटाले की फाइल फिर खोली गई। इस बीच, पूर्व बागवानी मंत्री सिंघी राम ने भाजपा ज्वाइन कर ली।
सूत्रों के अनुसार पूर्व बागवानी मंत्री सिंघी राम के खिलाफ सीधे सुबूत नहीं मिलने के बाद जयराम सरकार इसे लंबा नहीं खींचना चाह रही है, इसलिए अभियोजन अधिकारियों से जांच बंद करने को राय मांगी है। अभियोजन अधिकारियों की राय है कि पूर्व मंत्री को इस प्रकरण से बाहर कर भी जांच जारी रखी जा सकती है। इसमें कुछ अधिकारियों के खिलाफ ठोस सुबूत हैं।
2008 में शुरू हुई थी जांच
यह जांच 2008 में शुरू हुई थी। इसे विजिलेंस ने शिकायत संख्या 10/2008 के रूप में दर्ज किया था। कांग्रेस के खिलाफ भाजपा की चार्जशीट में शामिल किया था। आरोप थे कि वीरभद्र सरकार में सिंघी राम बागवानी मंत्री थे तो यह खरीद दिसंबर 2005 में की गई। दो तरह की प्रूनिंग कैंचियों और आरी की खरीद में अनियमितता बरती गई।
आरोप हैं कि मैसर्ज हर्बल नई दिल्ली को लगभग 25 से 26 लाख का अनुचित लाभ पहुंचाया। वास्तविक से ज्यादा दरों पर कैंचियां खरीदी गईं। करीब 66 लाख की खरीद सरकारी उपक्रम हिम एग्रो के माध्यम से उद्यान विभाग के दिशा-निर्देशों पर की गई। इसमें लगभग 10-11 लाख की अधिक अदायगी की गई। कंपनी को परिवहन और ऑपरेशनल चार्ज दिए, जो इस फर्म को देय नहीं थे।
जर्मनी की कंपनी ने कैंचियों के रेट 712.12 और 360.18 रुपये के अनुसार तय किए। आरी का क्रय 475.16 रुपये हुआ। जर्मनी की कंपनी के बजाय नई दिल्ली की फर्म से दो तरह की कैंचियों की खरीद 1231.25 और 692 रुपये में की गई। प्रति आरी की खरीद 825 रुपये के हिसाब से की गई। इस फर्म ने इन्हें जर्मनी की इस कंपनी से ही खरीदा।