बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा ने कहा कि चीन की सरकार ने तिब्बती धर्म को नष्ट करने की बहुत कोशिश की, लेकिन यह संभव नहीं हो सका। उन्होंने कहा कि बुद्ध के दर्शन को कोई नष्ट नहीं कर सकता है। भगवान बुद्ध के दर्शन की सांवृतिक सत्य तथा पारमार्थिक सत्य को साथ रखकर व्याख्या की गई है। दलाईलामा ने वीरवार को मैक्लोडगंज स्थित मुख्य बौद्ध मंदिर में आचार्य चंद्रकीर्ति की रचना माध्यमिकावतार की व्याख्या करते हुए ये बातें कहीं।
दलाईलामा ने कहा कि डॉक्टर से दवाई लेकर आप अपना मन शांत नहीं कर सकते। धर्मग्रंथों के अध्ययन और चिंतन से ही मन की शांति प्राप्त की जा सकती है। उन्होंने कहा कि तथागत बुद्ध ने 2600 वर्ष पहले जो दर्शन दिया था, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। बुद्ध का दर्शन है बुद्धम शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि और संघं शरणं गच्छामि। केवल शरण में जाने से कोई लाभ नहीं होगा। हमें तथागत बुद्ध के उपदेशों के बारे में चिंतन करना होगा।
इसके लिए भी पहले हमें उन उपदेशों का अध्ययन करना होगा। धर्मगुरु ने कहा कि बचपन से ही मैंने स्वयं भी महात्मा बुद्ध के विचारों का अध्ययन किया, उन्हें याद किया। इसके बाद मैं शरणार्थी बना। शरणार्थी बनने के बाद ग्रंथों के अध्ययन का और अच्छा अवसर मिला। इस बुरे वक्त का भी मैंने ग्रंथों के अध्ययन के रूप में सदुपयोग किया। हमें इन धर्मग्रंथों का ज्यादा से ज्यादा अध्ययन करना चाहिए। इस अध्ययन से निश्चित तौर पर मन में परिवर्तन आएगा।
धर्मगुरु ने कहा कि मेरा विचार है कि विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के आचार्यों के साथ करुणा और मैत्री जैसे मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए संवाद करूं। करुणा का जो संदेश हजारों वर्षों से इस भारतभूमि में जीवंत है, वह हमारी शिक्षा पद्धति में आना चाहिए। निर्वाण या सर्वज्ञता की बात करें तो ये बहुत दूर की बातें हैं। बुद्धत्व से पहले आपको दैनिक सुख प्राप्त होना चाहिए। हमारे लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम अभी के अपने जीवन में सुखी रहें।