सोमवार को राजपत्र में प्रकाशित हुई अधिसूचना में स्पष्ट किया है कि बोर्ड की कार्यवाही पारंपरिक कोर्टरूम जैसी नहीं होगी। सुनवाई चाइल्ड फ्रेंडली माहौल में होगी। बच्चे के सामने कोई बाधा या ऊंचा मंच नहीं होगा। बातचीत के दौरान भाषा, हावभाव और व्यवहार पूरी तरह संवेदनशील रहेगा। यह व्यवस्था बच्चों के मानसिक दबाव को कम करने के उद्देश्य से लागू की गई है। जरूरत पड़ने पर बोर्ड वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से भी सुनवाई कर सकेगा। वहीं आपात स्थिति में किसी भी दिन छुट्टियों में भी एक सदस्य उपलब्ध रहेगा। सामाजिक कार्यकर्ता सदस्यों को प्रति बैठक कम से कम 2000 रुपये का मानदेय मिलेगा। अनुवादक/विशेष शिक्षकों को 1500 रुपये प्रतिदिन तक भुगतान होगा। सभी खर्च स्टेट चाइल्ड प्रोटेक्शन सोसाइटी या जुवेनाइल जस्टिस फंड से किए जाएंगे।
नियमों में प्रावधान किया गया है कि यदि कोई बच्चा किसी मामले के चलते स्कूल से बाहर हो गया है, तो बोर्ड उसे दोबारा स्कूल में दाखिला दिलाने या पढ़ाई जारी रखने के आदेश दे सकेगा। हर बच्चे की प्रगति पर नजर रखने के लिए रिहैबिलिटेशन कार्ड जारी किया जाएगा। बोर्ड परिसर और बाल देखभाल संस्थानों में सजेशन/ग्रिवेंस बॉक्स लगाए जाएंगे। ऑनलाइन शिकायत प्रणाली भी विकसित की जाएगी। बोर्ड नियमित रूप से चाइल्ड केयर इंस्टीट्यूशंस का निरीक्षण करेगा। हर बच्चे को मुफ्त कानूनी सहायता सुनिश्चित करने के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से समन्वय किया जाएगा। जरूरत पड़ने पर स्वयंसेवकों और एनजीओ की मदद भी ली जाएगी। विभागीय अधिकारियों ने बताया कि इन नए नियमों से हिमाचल में किशोर न्याय प्रणाली अधिक संवेदनशील, पारदर्शी और बाल-केंद्रित बनने की उम्मीद है। खासतौर पर बच्चों के पुनर्वास, शिक्षा और मानसिक सुरक्षा पर जो फोकस किया गया है, उसे एक बड़ा सुधार माना जा रहा है।