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हिमाचल: मलबा हटाने की जिम्मेदारी जुर्माने तक ही सीमित क्यों, हाईकोर्ट ने लगाई फटकार

Fri, 15 Nov 2024 11:07 AM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला

सार

हाईकोर्ट ने गोबिंद सागर झील और उसके आसपास के क्षेत्र में अवैध रूप से मलबा फेंकने के मामले में राज्य सरकार और संबंधित विभागों को फटकार लगाई है। 
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अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल हाईकोर्ट ने गोबिंद सागर झील और उसके आसपास के क्षेत्र में अवैध रूप से मलबा फेंकने के मामले में राज्य सरकार और संबंधित विभागों को फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि दोषियों पर केवल जुर्माना लगाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें मलबा हटाने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए। कोर्ट ने मामले में गंभीरता दिखाते हुए अधिकारियों को सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। बता दें कि किरतपुर-मनाली फोरलेन के निर्माण के दौरान झील और इसके आसपास अवैध रूप से मलबा फेंका गया था।

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 कारण बताओ नोटिस जारी
 कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश सत्येन वैद्य की खंडपीठ ने कोर्ट को गुमराह करने के आरोप में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के पर्यावरण अभियंता चंदन सिंह को कारण बताओ नोटिस जारी किया। उन्होंने दलील दी कि नए कानून के अनुसार कार्रवाई नहीं की जा सकती। इसी को कोर्ट ने अवमानना माना। वहीं, देरी से एफआईआर दर्ज कराने के लिए बिलासपुर के वन मंडल अधिकारी से भी शपथपत्र मांगा है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव और मंडल वन अधिकारी को अपने हलफनामे 4 दिसंबर तक प्रस्तुत करने को कहा है।

11 दिसंबर को होगी सुनवाई
अगली सुनवाई 11 दिसंबर को होगी। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 11 नवंबर को हलफनामे में बताया कि विभिन्न कंपनियों पर 85,87,500 रुपये का जुर्माना लगाया गया है। कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताई और पूछा कि मलबा हटाने की जिम्मेदारी केवल जुर्माना लगाने तक ही सीमित क्यों है। न्यायालय ने आदेश दिया कि दोषियों से मलबा हटाया जाए। यदि वे ऐसा करने में विफल रहते हैं, तो अदालत की अवमानना माना जाएगा। सरकार ने बताया कि मामले में आठ एफआईआर दर्ज की गई हैं, परंतु ये सभी ए21 अक्तूबर को ही दर्ज की गईं।

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यह है मामला
किरतपुर-मनाली फोरलेन के निर्माण के दौरान गोबिंद सागर झील और सहायक नदी/खड्डों में अवैध मलबा फेंकने की शिकायत की गई थी। पहली सुनवाई 31 मई को हुई थी। न्यायालय ने दोषियों पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई करने और मलबा हटाने का आदेश दिया था। काम छह महीने के भीतर पूरा करने को कहा था। 8 अगस्त को जब यह मामला फिर से न्यायालय में आया, तो न्यायालय ने पाया कि राज्य सरकार ने केवल जुर्माना लगाया। मलबा हटाने की दिशा में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की है।
 
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