सरकार की ओर से बताया गया कि इस मामले में विवाद यह है कि क्या नियमितीकरण से पहले दैनिक वेतनभोगी के रूप में की गई सेवा अवधि को पेमेंट ऑफ ग्रेच्युटी एक्ट 1972 के तहत ग्रेच्युटी की गणना में शामिल किया जाए या नहीं, जबकि नियमित सेवा अवधि की गणना सीसीएस पेंशन नियम 1972 के अनुसार की जाती है। हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ पहले ही मामले को बड़ी पीठ (लार्जर बेंच) के समक्ष भेज चुकी है।
खंडपीठ ने कहा कि चूंकि यह मामला बड़ी पीठ के विचाराधीन है, इसलिए अंतिम निर्णय आने तक यथास्थिति बनाए रखना उचित होगा। अदालत ने इस मामले से संबंधित पांच अन्य अपीलों को भी एक साथ सुनवाई के लिए टैग करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी।
24 फरवरी को हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने वन विभाग के सेवानिवृत्त चौकीदारों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि नियमितीकरण से पूर्व दैनिक वेतनभोगी के रूप में दी गई सेवा अवधि को ग्रेच्युटी की गणना से बाहर नहीं रखा जा सकता। लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मचारियों को तकनीकी आधार पर उनके वैधानिक लाभ से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
यह विवाद वन विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारियों से जुड़ा है। बीनू राम सहित अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति वर्ष 1998 में दैनिक वेतनभोगी चौकीदार के रूप में हुई थी और अगस्त 2006 में उनकी सेवाएं नियमित की गईं। 31 अक्तूबर 2017 को सेवानिवृत्ति के बाद ग्रेच्युटी का भुगतान नहीं होने पर उन्होंने लेबर ऑफिसर का रुख किया। लेबर ऑफिसर ने कर्मचारियों के पक्ष में फैसला देते हुए 2.47 लाख रुपये की ग्रेच्युटी और उस पर ब्याज का भुगतान करने के आदेश दिए थे।