हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 7 जुलाई 2026 को दिए आदेश में कहा था कि परिषद धारा 18(2) के तहत विवादों के निपटारे के लिए किसी व्यक्तिगत मध्यस्थ के पास मामला नहीं भेजेगी। एकल पीठ ने पहले दिए गए एक मध्यस्थता फैसले को भी रद्द कर दिया था। इस आदेश के बाद लघु उद्योग इंडस्ट्रीज एसोसिएशन ने जनहित याचिका दायर कर की थी। एसोसिएशन का कहना था कि मध्यस्थों का चयन सरकार की ओर से निर्धारित पैनल से किया गया था। ऐसे में एकल पीठ के आदेश के आधार पर पहले जारी सभी मध्यस्थता फैसलों को स्वतः रद्द या अमान्य नहीं माना जाना चाहिए।
चुनौती देने के लिए याचिका उचित माध्यम नहीं
खंडपीठ ने कहा कि एकल पीठ के फैसले को चुनौती देने या उसमें बदलाव कराने के लिए जनहित याचिका उचित माध्यम नहीं है। इसके लिए प्रभावित पक्षों को कानून में निर्धारित प्रक्रिया के तहत नियमित अपील दायर करनी होगी। सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि प्रभावित पक्षों ने एकल पीठ के आदेश के खिलाफ नियमित अपील दायर नहीं की है। इस पर खंडपीठ ने याचिकाकर्ता को नियमानुसार उचित कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता देते हुए याचिका का निपटारा कर दिया।
रेव पार्टियों पर रोक की मांग, आवेदनों पर 19 नवंबर को सुनवाई
कुल्लू, मनाली और कसोल में होने वाली रेव पार्टियों पर रोक लगाने की मांग तेज हो गई है। विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं और स्थानीय प्रतिनिधियों की ओर से दी गई अर्जियों पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 19 नवंबर तय की है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ के समक्ष सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रतिनिधियों की ओर से कई आवेदन पेश किए गए हैं। इनमें स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि कसोल और मनाली क्षेत्रों में रेव पार्टियों को आयोजित करने की कोई भी प्रशासनिक अनुमति न दी जाए। कुल्लू की ग्राम पंचायत बंदरोल के प्रधान की ओर से आवेदन देकर अपने क्षेत्र और आसपास के इलाकों में रेव पार्टियों के आयोजन पर कड़ा एतराज जताया गया है। हिमालयन एन्वायरनमेंट प्रोटेक्शन संस्था के अध्यक्ष ने भी कसोल और मनाली घाटी में ऐसी पार्टियों के आयोजन के खिलाफ औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई है।