इसके 11 साल बाद यानी अगस्त 2021 में बढ़ोतरी के लिए आवेदन किया गया। अदालत ने कहा कि इन 11 वर्षों में चीजों के दाम और बच्चों की पढ़ाई का खर्च काफी बढ़ गया है। ऐसे में कुल राशि को बढ़ाकर 20,000 रुपये (पत्नी के लिए 10,000 और बच्चों के लिए 5,000-5,000) करना किसी भी तरह से अत्यधिक या गलत नहीं है। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि उसकी पत्नी बिना किसी ठोस वजह के उससे अलग रह रही है और उसने उसे परेशान करने के लिए कई शिकायतें की हैं। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि धारा 125 सीआरपीसी के तहत पिछले मुकदमे में ही यह तय हो चुका था कि पत्नी के पास अलग रहने का वैध कारण है और पति ने उसे स्वीकार भी किया था, इसलिए धारा 127 (गुजारा भत्ते में बदलाव) की कार्यवाही में पति दोबारा इन पुरानी बातों को आधार बनाकर मेंटेनेंस बढ़ाने का विरोध नहीं कर सकता।
दलील दी गई कि याचिकाकर्ता की तनख्वाह 44 हजार रुपये है और उसे अपनी बूढ़ी मां को भी चार हजार रुपये देने होते हैं, इसलिए वह 20,000 रुपये नहीं दे सकता। हालांकि, जिरह के दौरान यह सामने आया कि उसके पिता एक सेवानिवृत्त सेना कर्मी हैं और उन्हें अच्छी पेंशन मिलती है। अदालत ने माना कि पति के पास मेंटेनेंस का विरोध करने का कोई ठोस आधार या दस्तावेज नहीं है। पति ने एक और दलील दी कि भविष्य में रिटायरमेंट के बाद उसकी आय कम हो जाएगी, इसलिए कोर्ट अभी से मेंटेनेंस की राशि घटा दे।इस पर अदालत ने कहा कि यह दलील फैमिली कोर्ट के सामने नहीं रखी गई थी। अदालत ने सुझाव दिया कि यदि भविष्य में परिस्थितियां बदलती हैं (जैसे आय कम होना), तो पति कानून के तहत मेंटेनेंस राशि में बदलाव के लिए अलग से नया आवेदन करने के लिए स्वतंत्र है,लेकिन इस आधार पर मौजूदा आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता।
शास्त्री भर्ती नियमों में विसंगति पर दायर याचिकाओं पर 28 को होगी सुनवाई
प्रदेश हाईकोर्ट में शास्त्री शिक्षकों के भर्ती नियमों में विसंगति को लेकर दायर याचिकाओं पर अब 28 जुलाई को सुनवाई होगी। यह मामला मंगलवार को न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ के समस्त सूचीबद्ध किया गया था। याचिकाओं में बताया गया है कि जिन अभ्यर्थियों ने शास्त्री डिग्री (जो संस्कृत में विशेषज्ञता के साथ बीए ऑनर्स स्नातक डिग्री के समकक्ष है) उत्तीर्ण की है, उन्हें इस भर्ती की पात्रता सूची और विचार क्षेत्र से पूरी तरह बाहर कर दिया गया है। इसके विपरीत जिन लोगों ने सामान्य बीए में केवल एक वैकल्पिक विषय के रूप में संस्कृत पढ़ी है, उन्हें इस पद के लिए पात्र बना दिया गया है। अदालत ने इस मामले में कहा था कि योग्यता निर्धारित करना पूरी तरह से राज्य सरकार का विशेषाधिकार है। लेकिन, यह एक ऐसा मामला है, जहां शास्त्री डिग्री धारकों को बाहर रखा गया है, जबकि वैकल्पिक विषय के रूप में संस्कृत पढ़ने वालों को पात्र बनाया गया है। अदालत ने कहा था कि प्रथम दृष्टया ये नियम मनमाने प्रतीत होते हैं।
सत्या देवी मामले में सरकार की एसएलपी खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिमाचल प्रदेश सरकार प्रतिवादी सत्या देवी को इस आधार पर किसी भी लाभ से वंचित नहीं कर सकती कि उन्हें 60 वर्ष के बजाय 58 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त होना था। अदालत ने इस जानकारी के बाद याचिका को खारिज कर दिया कि कर्मचारी को 60 वर्ष की आयु तक सेवा जारी रखने की अनुमति दी गई थी। उसी आधार पर उनके सेवानिवृत्ति लाभ भी जारी किए जा चुके हैं। सोमवार को हुई मामले की सुनवाई के मंगलवार को जारी हुए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानूनी सवाल भविष्य के लिए खुला रखा गया है। हिमाचल प्रदेश के एडवोकेट जनरल अनूप रतन ने कोर्ट को सूचित किया था कि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की ओर से इस मामले से जुड़े फैसले के आधार पर कई अन्य रिट याचिकाएं और मामले निपटाए जा रहे हैं। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने राज्य सरकार की इस चिंता को देखते हुए निर्देश दिया कि हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के इस फैसले को भविष्य में लंबित पड़े अन्य मामलों या कार्यवाहियों को तय करते समय एक प्रेसिडेंट (आधार) के रूप में नहीं पढ़ा जाएगा।
पुलिस विभाग में राजमिस्त्री भी समान काम के लिए समान वेतन के हकदार : हाईकोर्ट
प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग के राजमिस्त्रियों को लोक निर्माण विभाग के समान वेतनमान देने का आदेश दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल विभाग अलग होने से कर्मचारियों के वेतनमान में भेदभाव नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की अदालत ने वर्ष 2009 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें वेतन समानता की मांग खारिज कर दी गई थी। अदालत ने पाया कि पुलिस विभाग में राजमिस्त्री पद के लिए कोई अलग भर्ती या पदोन्नति नियम नहीं थे। इसके बावजूद विभाग ने इस कुशल पद को चतुर्थ श्रेणी मानकर बेलदारों के समान कम वेतनमान दिया। राज्य सरकार ने 1997 की अधिसूचना में तकनीकी और कुशल पदों को जूनियर तकनीशियन के रूप में पुनर्गठित किया था। ऐसे में राजमिस्त्री जैसे कुशल पद को चतुर्थ श्रेणी में रखना पूरी तरह अवैध, अतार्किक और भेदभावपूर्ण है।
यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है। सरकार ने दलील दी थी कि पुलिस विभाग की आवश्यकताएं अलग हैं और याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति चतुर्थ श्रेणी के तहत हुई थी। अदालत ने कहा कि राजमिस्त्री का काम चाहे वह किसी भी विभाग में हो, एक समान ही रहता है। लोक निर्माण विभाग और पुलिस विभाग के राजमिस्त्री एक जैसी तकनीकी जिम्मेदारियां निभाते हैं। याचिकाकर्ताओं के पास पीडब्ल्यूडी नियमों के तहत आवश्यक योग्यता भी थी। समान कार्य के लिए समान वेतन का सिद्धांत अब मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त कर चुका है। याचिकाकर्ताओं को उनकी नियुक्ति की तिथि से पीडब्ल्यूडी के राजमिस्त्रियों के समान वेतनमान मिलेगा। यह वेतनमान 950-1800 रुपये और 1 जनवरी 1996 से संशोधित 3120-5160 रुपये होगा। याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2010 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। इसलिए नया वेतनमान नियुक्ति की तिथि से काल्पनिक रूप से लागू होगा। वास्तविक वित्तीय लाभ याचिका दायर करने की तिथि से 3 वर्ष पूर्व की अवधि से देय होगा। राज्य सरकार को यह वित्तीय लाभ और एरियर आदेश की तारीख से तीन महीने के भीतर जारी करना होगा। यदि सरकार तय समय में भुगतान नहीं करती है, तो उसे एरियर पर 6 फीसदी वार्षिक दर से ब्याज भी देना होगा।