हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में मंगलवार को मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की नियुक्तियों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने अदालत को बताया कि तीनों याचिकाओं में मूल प्रश्न यह है कि सीपीएस की नियुक्तियां संविधान के अनुरूप नहीं हुई हैं। इसे चुनौती दी गई है। मामले की सुनवाई न्यायाधीश न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति बीसी नेगी की खंडपीठ ने की। अब अगली सुनवाई 22 से 24 अप्रैल तक लगातार तीन दिन होगी।
वर्तमान कांग्रेस सरकार ने अपने छह विधायकों संजय अवस्थी, सुंदर सिंह ठाकुर, राम कुमार चौधरी, किशोरी लाल, मोहन लाल ब्राक्टा और आशीष बुटेल को सीपीएस बनाया है। इनके खिलाफ उच्च न्यायालय में अलग-अलग तीन याचिकाएं दायर की गई हैं। सबसे पहले वर्ष 2016 में पीपल फॉर रिस्पांसिबल गवर्नेंस संस्था ने सीपीएस की नियुक्तियों को चुनौती दी थी। बाद में कल्पना देवी ने और उसके बाद भाजपा नेता विधायक सतपाल सिंह सत्ती सहित 12 भाजपा विधायकों ने मुख्य संसदीय सचिव की नियुक्ति को प्रदेश हाईकोर्ट में चुनौती दी।
अदालत इन तीनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करेगी। याचिकाओं में कहा गया है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद-164 के तहत प्रदेश में 15 प्रतिशत से ज्यादा मंत्रिमंडल नहीं बनाया जा सकता। सीपीएस बनाने के बाद यह संख्या 17-18 पहुंच गई है। हाईकोर्ट ने सीपीएस के कार्यों पर पहले ही रोक लगाई है। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि सीपीएस न तो मंत्रियों की तरह काम करेंगे और न ही वे मंत्रियों वाली सुविधाएं लेंगे।