प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना देवभूमि में आई थी। पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर इसके लिए सोलन और सिरमौर जिलों के 225 गांवों को इसमें चुना गया था। इस स्कीम के लिए केन्द्र से पैसा भी आया लेकिन हिमाचल में कांग्रेस सरकार की तिजोरी में बंद पड़ा रहा। अब स्कीम खत्म हो गई है। केन्द्र की टीम हिसाब मांगने आने वाली है अफसरों को समझ में नहीं आ रहा वह क्या जबाव दें।
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लोकसभा चुनाव में हिमाचल कांग्रेस की दुर्दशा क्यों हुई, यह कहानी इसकी गवाह है। केंद्र सरकार ने फरवरी 2011 में उत्तर प्रदेश को हटाकर हिमाचल को इस योजना में लिया। पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर सोलन और सिरमौर जिलों के ऐसे 225 गांवों को इसमें चुना गया, जिनमें अनुसूचित जाति की आबादी 50 फीसदी से ज्यादा है।
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इस योजना में राजगढ़ के 31, पच्छाद के 29, नाहन के 20, पांवटा के 20, संगड़ाह के 25, कुनिहार के 24, धर्मपुर के 34, सोलन के 25 और कंडाघाट के 17 गांव लिए गए। योजना के तहत हर गांव में 20 लाख रुपये जनसुविधा के कार्यों पर गैप फंडिंग के मार्फत खर्च होने थे।
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केंद्र सरकार ने अपने हिस्से की 90 फीसदी राशि के 40 करोड़ दे दिए। ये धन उपायुक्तों को ट्रांसफर भी हो गए। 10 फीसदी भागीदारी राज्य सरकार की थी। ये बजट डीसी ऑफिस और डीआरडीए को गांवों में खर्च करना था।
पर बीती 31 मार्च को योजना की अवधि पूरी हो गई है। अब इन योजनाओं की समीक्षा के लिए केंद्रीय समन्वय समिति के एक सदस्य 5 और 6 जून को शिमला आ रहे हैं।
इससे पहले जब सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के सचिव ने बैठक बुलाई तो पता चला कि स्कीम में अभी 20 फीसदी बजट भी खर्च नहीं हुआ है। गांवों में खर्च होने वाला पैसा उपायुक्त कार्यालयों में पड़ा है। अब राज्य सरकार ने इस धन को खर्च करने के लिए भारत सरकार से अतिरिक्त समय मांगा है।
विभाग के निदेशक शरभ नेगी कहते हैं कि भौगोलिक दृष्टि से अन्य राज्यों के मुकाबले हिमाचल में तय समय के भीतर बजट खर्च करना मुश्किल है। इसलिए अतिरिक्त समय मांगा है। उन्होंने दावा किया कि स्कीम अभी पूरी तरह बंद नहीं हुई है और बजट लैप्स नहीं होने देंगे।