मई 2009 में इन कर्मचारियों ने साप्ताहिक अवकाश न मिलने की शिकायत लेबर इंस्पेक्टर से की थी और ईपीएफ अधिनियम के तहत नोटिस भी जारी करवाया था। आवाज उठाने के कारण विभाग ने 7 अगस्त 2009 को इनकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं। इसके बाद कर्मचारियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया साल 2010 में अदालत के अंतरिम आदेश के बाद उन्हें 7 जनवरी 2010 को दोबारा काम पर रख लिया गया था। बाद में औद्योगिक न्यायाधिकरण ने भी कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाया।
16 सितंबर 2021 को सिंगल जज बेंच ने न केवल औद्योगिक न्यायाधिकरण के बहाली के फैसले को सही ठहराया, बल्कि कर्मचारियों को उनकी बर्खास्तगी की अवधि लगभग 5 महीने का पूरा पिछला वेतन, वरिष्ठता और सेवा की निरंतरता देने के भी निर्देश दिए। राज्य सरकार ने इस फैसले को खंडपीठ के समक्ष चुनौती दी थी। खंडपीठ ने सरकार की दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि कर्मचारी 1996 से विभाग में सेवाएं दे रहे थे और उन्हें बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के केवल इसलिए निकाल दिया गया, क्योंकि वे कानूनी अधिकारों की मांग कर रहे थे। खंडपीठ ने सिंगल जज और ट्रिब्यूनल के फैसलों में हस्तक्षेप करने से साफ इन्कार कर दिया।