राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर ने राज्य बाल कल्याण परिषद की वार्षिक बैठक की अध्यक्षता की। उन्होंने परिषद की आय के स्रोत बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। परिषद को अपनी गतिविधियों में आजीवन सदस्यों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने का भी सुझाव दिया। राज्यपाल ने कहा कि जमीनी स्तर पर संसाधन जुटाने के लिए जिला उपायुक्त सहयोग कर सकते हैं। मंदिरों की आय और निगमित सामाजिक दायित्व फंड से भी यह सुनिश्चित किया जा सकता है। राज्य बाल कल्याण परिषद को एक विभाग की तरह संचालित नहीं किया जाना चाहिए। सुझाव दिया कि मंदिर न्यास, परोपकारी संस्थाओं सहित समाज के समृद्ध वर्गों को आगे बढ़कर चैरिटेबल गतिविधियों के माध्यम से इस संस्थान के फंड और संसाधनों को बढ़ाने में योगदान देना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों को सभी आश्रमों का नियमित तौर पर निरीक्षण करने के निर्देश दिए। कहा कि परिषद के सभी सदस्यों को स्वयंसेवकों के रूप में कार्य करना चाहिए। परिषद की बैठकें नियमित करने के भी निर्देश दिए।
मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने परिषद के बेहतर संचालन के लिए निगमित सामाजिक दायित्व के अंतर्गत निजी क्षेत्र को सक्रिय सहयोग देने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता पर बल दिया। कहा कि परिषद के आजीवन सदस्यों के सदस्यता शुल्क को पांच हजार से बढ़ाकर 11 हजार किया जाना चाहिए। कहा कि हिमाचल देवभूमि होने से प्रदेशवासियों में मानवीय सोच की अधिकता के कारण राज्य में परिजनों की ओर से अभिभावकों एवं वृद्ध जनों के परित्याग के मामले कम सामने आते हैं। समाज के इस वर्ग के कल्याण के लिए विभिन्न परियोजनाएं शुरू करने के लिए औद्योगिक घरानों को भी प्रेरित किया जाना चाहिए। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री सरवीण चौधरी ने परिषद के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि विभाग निराश्रित बच्चों, विशेष रूप से सक्षम और बुजुर्गों के अधिकारों के प्रति संवेदनशील है। बाल विकास परिषद की महासचिव पायल बहल वैद्य ने बैठक की कार्यवाही का संचालन किया।