धीरे-धीरे मंगलाचारी परिवार होने के कारण इन पर अपने पुश्तैनी काम की भी जिम्मेदारी पड़ गई और यह दूर-दूर तक घरों में शादी, जन्मदिन और अन्य शुभ कार्यों में जाकर अपनी शहनाई बजाते रहे।
मात्र तीसरी कक्षा तक शिक्षित इस कलाकार की इस कला का जादू इस कदर बोला कि जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के मेलों में अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिला।
सूरजमणि बताते हैं कि उनको अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव से सबसे अधिक पहचान मिली है। आज भी इस मेले की सांस्कृतिक संध्याओं का आगाज इनकी शहनाई से होता है।
सूरजमणि ने बताया कि इनकी माता मर्ची देवी अच्छी गायक थीं और बेहतरीन ढोलक बजाती थीं। इनके ताया गुजू राम संगीत कला के बहुत बड़े जानकार थे। माता और ताया से उन्हें शहनाई वादन की बहुत अधिक शिक्षा मिली है। देवी-देवताओं के साथ शहनाई बजाकर और दूर-दूर तक मंगलाचार सुनाकर उनकी शहनाई की कला में नया निखार आता रहा।
युवा आगे आएं तो सिखाने को तैयार
लोक कलाकार ने कहा कि आधुनिक दौर में शहनाई की कला लुप्त हो रही है। युवाओं में इस कला को सीखने की कोई रुचि नहीं दिख रही है। कई युवा कलाकार आधुनिकता भरे गीत और संगीत में डूब चुके हैं। इस कला से हर कोई मुंह फेर रहा है। उन्होंने इस पर चिंता जताई और युवा कलाकारों को इस कला को जीवंत रखने के लिए आगे आने को कहा। उन्होंने कहा कि अगर सरकार उनकी कुछ मदद करे तो वह युवाओं को निशुल्क सिखाने को तैयार हैं।