हिमाचल विधानसभा चुनाव 2017 के एग्जिट और ओपिनियन पोल के नतीजें कांग्रेस के लिए बड़ा झटका है। विभिन्न न्यूज चैनलों के एग्जिट और ओपिनियन पोल हिमाचल में कांग्रेस का सूफड़ा साफ बता रहे हैं।
कुल मिलाकर हिमाचल में कमल खिलेगा और धूमल के सिर सीएम का ताज सजेगा। इन एग्जिट पोल के मुताबिक हिमाचल में वीरभद्र सिंह सरकार की विदाई तय है।
ऐसे में छह बार हिमाचल के सीएम रहे वीरभद्र सिंह और कांग्रेस की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगती दिख रही है। एग्जिट पोल की माने तो कांग्रेस तीनों ही जोन कांगड़ा, मंडी और शिमला में बड़े अंतर से हार रही है। वीरभद्र सिंह का भी संभवतः ये अंतिम चुनाव है, ऐसे में ये हार कई मायनों में कांग्रेस के लिए अहम है।
इससे मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह खुद शह और मात के खेल में फंस गए हैं। 55 वर्ष लंबी सियासी पारी में 6 बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र पहली बार शिमला जिले से बाहर निकल कर सोलन के अर्की से चुनाव लड़ा हैं। वीरभद्र के अनुभव और राजनीतिक कौशल से कांग्रेस मुकाबले में है, लेकिन खुद को साबित करने की चुनौती में पासिंग मार्क्स से गुजारा नहीं चलेगा।
क्या इन कारणों से हुई हार
सवाल ये भी है कि क्या विधानसभा चुनाव में इस बार भी निर्दलीयों ने कांग्रेस के चुनावी समीकरण बिगाड़ दिए हैं। वर्ष 2012 विधानसभा चुनाव पर नजर दौड़ाएं तो जिला कांगड़ा, मंडी और सोलन में निर्दलीय ने कांग्रेस उम्मीदवारों के पसीने छुड़ा दिए थे।
सवाल ये भी है कि क्या हिमाचल कांग्रेस सरकार की ओर से पिछले पांच वर्षों में किया गया विकास जनता को रास नहीं आया। कर्मचारियों से लेकर हर वर्ग के लिए चुनाव से ठीक पहले दर्जनों बड़े निर्णय लिए गए, धड़ाधड़ उद्घाटन और शिलान्यास हुए। लेकिन एग्जिट पोल के नतीजें सरकार के इन फैसलों को नकारते दिख रहे हैं।
एग्जिट पोल के नतीजों से ये अनुमान भी लगाए जा रहे हैं कि चुनाव के दौरान हिमाचल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताबड़तोड़ रैलियां कांग्रेस पर भारी पड़ गई। मोदी सहित अमित शाह और अन्य सभी बड़े केंद्रीय मंत्रियों ने हिमाचल में रैलियां की और कांग्रेस की नाकामी को जनता के समक्ष उठाने में सफल रहे।
जबकि कांग्रेस की ओर से कोई बड़ा नेता हिमाचल नहीं पहुंचा। मतदान से ठीक पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने एक ही दिन में कई रैलियां कर डाली। जबकि बाकि चुनावी प्रचार में सीएम वीरभद्र सिंह अकेले ही मोर्चे पर डटे रहे। कांग्रेस की संभावित हार की ये भी एक बड़ी वजह मानी जा रही है।
हिमाचल में सरकारें बनाने में ये समीकरण भी अहम
हिमाचल में बीते दो विधानसभा चुनावों में सरकारें चार फीसदी मतों के अंतर से बनती रही हैं। विधानसभा चुनावों में विजयी दल अपनी जीत में बड़ा अंतर नहीं ला सके हैं। साल 2003 से लेकर 2012 तक के चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवार 14 से 16 फीसदी तक वोट प्राप्त करते आए हैं।
निर्दलियों के यही वोट बड़े दलों के नेताओं की जीत-हार को तय करते हैं। जिस सीट पर निर्दलीय खड़े होते हैं, बीते तीन चुनावों से समीकरण बदलते रहे हैं। साल 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशियों को कुल 43.21 फीसदी मत पड़े।
भाजपा को 38.83, निर्दलियों को 15.87 और हिमाचल लोकहित पार्टी को 4.52 मत हासिल हुए। 2012 में कांग्रेस ने भाजपा से 4.38 मत अधिक प्राप्त कर प्रदेश में सरकार बनाई।
साल 2007 के चुनाव में भाजपा को 43.78 फीसदी, कांग्रेस को 39.54 फीसदी और निर्दलियों को 14.34 मत प्राप्त हुए। भाजपा की जीत का अंतर 4.24 फीसदी मत रहे। 2003 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 41 फीसदी वोट मिले। भाजपा को 35.38 फीसदी और निर्दलियों को 16.27 फीसदी मत पड़े। कांग्रेस ने 2003 में 5.62 फीसदी मत अधिक प्राप्त कर प्रदेश में सरकार बनाई।