साल 2017 के विधानसभा चुनाव परिणाम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी होना ही जीत की गारंटी नहीं हो सकता। धूमल के चुनाव हारने से पहले हिमाचल की जनता वीरभद्र सिंह और शांता कुमार को भी मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी होने के बावजूद हरा चुकी है। इस बार आधा दर्जन से ज्यादा मंत्रियों और मुख्य संसदीय सचिवों (सीपीएस) की कुर्सी भी चली गई।
प्रदेश भाजपा के सबसे कद्दावर नेता प्रेम कुमार धूमल को इस बार पार्टी ने हमीरपुर सीट की बजाय सुजानपुर से चुनाव लड़ने को कहा। जीत सुनिश्चित करने को केंद्रीय नेतृत्व ने डबल इंजन का फार्मूला बताकर धूमल का नाम बतौर मुख्यमंत्री घोषित कर दिया।
उम्मीद थी कि धूमल अपनी सीट तो जीतेंगे, साथ ही पार्टी के 50 प्लस के लक्ष्य को भी आसानी से पार किया जा सकेगा, लेकिन जिस सीट से धूमल मैदान में थे, वहां उनके शिष्य और प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस नेता राजेंद्र राणा लंबे समय से लोगों के बीच रहकर काम कर रहे थे।
लोगों ने स्थानीय बनाम बाहरी और लोकप्रिय बनाम बड़ा कद की लड़ाई में धूमल को शिकस्त दे दी। यह पहली बार नहीं था, जब मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी को हिमाचल की जनता ने हरा दिया।
इससे पहले 1993 के विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के ही मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी शांता कुमार को पालमपुर से हार का सामना करना पड़ा था। यही नहीं, मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह भी कोटखाई के लोगों ने 1989 में हार का स्वाद चखाया था।
खास बात यह है कि ये तीनों ही नेता हिमाचल और देश की राजनीति में बड़े नाम के तौर पर जाने जाते रहे हैं, लेकिन हिमाचल ने धूमल को हराने के साथ ही स्पष्ट कर दिया है कि जो जनता के हित में काम नहीं करेगा, उसका कद कितना भी ऊंचा हो, उसकी भी जीत अनिश्चित ही रहती है।