हिमाचल हाईकोर्ट ने सत्ता परिवर्तन के बाद विभिन्न विकास कार्यों की योजनाओं के धड़ाधड़ हो रहे शिलान्यास और पहले से रुके प्रोजेक्टों पर कड़ा संज्ञान लिया है। इस पर प्रदेश सरकार से पिछले पांच वर्षों की रिपोर्ट तलब की है।
न्यायाधीश संजय करोल और न्यायाधीश पीएस राणा की खंडपीठ ने प्रदेश के मुख्य सचिव को आदेश दिए कि वह शपथ पत्र के माध्यम से बताएं कि पिछले पांच वर्षों में कितनी स्कीमों के लिए कितनी कितनी धनराशि स्वीकृत की गई है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से यह भी पूछा है कि ऐसी कितनी योजनाओं का शिलान्यास किया गया है, जिसके लिए बजट का प्रावधान रखा गया है। ऐसी कितनी योजनाएं हैं जिनका निर्माण कार्य शिलान्यास के बाद शुरू नहीं हुआ है। कितने प्रोजेक्ट ऐसे हैं, जिनका निर्माण कार्य अधूरा छोड़ा गया है।
इन पर कितना पैसा खर्च हुआ है। अदालत ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि राज्य सरकार राजनीतिक लोगों के लिए इस तरह के निर्णय लेती है, जिसका कोई आधार नहीं होता है। अदालत ने असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल अशोक शर्मा को मामले की पैरवी करने के लिए नियुक्त किया है।
विधानसभा में भी उठ चुका है मामला- सरकार की ओर से किए जा रहे ताबड़तोड़ शिलान्यास का मसला भाजपा की ओर से विधानसभा में भी उठाया जा चुका है। विपक्ष की ओर से बार-बार यह आरोप लगाया जाता है कि विधायक निधि से बनी योजनाओं का भी कोई और शिलान्यास और उद्घाटन कर रहा है। भाजपा का यह भी आरोप है कि उनके कार्यकाल की योजनाओं को डंप कर दिया गया है।