हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए यूं तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ही भाजपा आलाकमान की पसंद थे, मगर जातिगत समीकरण के खिलाफ जाने की आशंका को खत्म करने के लिए मुहर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल पर लगी।
पार्टी आलाकमान को मुख्यमंत्री पद की दौड़ से धूमल को बाहर करने पर राजपूत बिरादरी के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पक्ष में गोलबंद होने का भय सता रहा था।
गौरतलब है कि राज्य की कुल आबादी में जहां राजपूत बिरादरी की भागीदारी 37 फीसदी से भी अधिक है, वहीं ब्राह्मण बिरादरी की आबादी करीब 18 फीसदी है। यही कारण है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मंगलवार को एक रैली में अचानक धूमल के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी।
दरअसल, आलाकमान ने नड्डा पर दांव लगाने की तैयारी दो वर्ष पूर्व ही कर ली थी। इसी रणनीति के तहत उनकी सक्रियता राज्य में बढ़ाई गई। पीएम नरेंद्र मोदी, अध्यक्ष शाह की राज्य में होने वाली रैलियों की जिम्मेदारी भी खासतौर से नड्डा को दी गई।
तब आलाकमान की योजना नड्डा के नाम की घोषणा कर चुनाव मैदान में उतरने की थी। मगर चुनाव आते-आते आलाकमान ने अपनी रणनीति में बदलाव कर चुनाव बाद नड्डा की ताजपोशी का फैसला किया।
सूत्रों के मुताबिक इसी रणनीति के तहत बिलासपुर सदर सीट पर नड्डा के विश्वस्त सुभाष ठाकुर को उम्मीदवार बनाया गया, जिससे जरूरत पड़ने पर यह सीट नड्डा के लिए खाली कराई जा सके।