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हिमाचल चुनाव : जातिगत गणित में धूमल से जीती बाजी हारे नड्डा

Wed, 01 Nov 2017 03:25 PM IST
हिमांशु मिश्र/अमर उजाला, नई दिल्ली
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हिमाचल प्रदेश में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए यूं तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ही भाजपा आलाकमान की पसंद थे, मगर जातिगत समीकरण के खिलाफ जाने की आशंका को खत्म करने के लिए मुहर पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल पर लगी। 
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पार्टी आलाकमान को मुख्यमंत्री पद की दौड़ से धूमल को बाहर करने पर राजपूत बिरादरी के कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के पक्ष में गोलबंद होने का भय सता रहा था। 

गौरतलब है कि राज्य की कुल आबादी में जहां राजपूत बिरादरी की भागीदारी 37 फीसदी से भी अधिक है, वहीं ब्राह्मण बिरादरी की आबादी करीब 18 फीसदी है। यही कारण है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मंगलवार को एक रैली में अचानक धूमल के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी।
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दरअसल, आलाकमान ने नड्डा पर दांव लगाने की तैयारी दो वर्ष पूर्व ही कर ली थी। इसी रणनीति के तहत उनकी सक्रियता राज्य में बढ़ाई गई। पीएम नरेंद्र मोदी, अध्यक्ष शाह की राज्य में होने वाली रैलियों की जिम्मेदारी भी खासतौर से नड्डा को दी गई। 

तब आलाकमान की योजना नड्डा के नाम की घोषणा कर चुनाव मैदान में उतरने की थी। मगर चुनाव आते-आते आलाकमान ने अपनी रणनीति में बदलाव कर चुनाव बाद नड्डा की ताजपोशी का फैसला किया। 

सूत्रों के मुताबिक इसी रणनीति के तहत बिलासपुर सदर सीट पर नड्डा के विश्वस्त सुभाष ठाकुर को उम्मीदवार बनाया गया, जिससे जरूरत पड़ने पर यह सीट नड्डा के लिए खाली कराई जा सके।
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नेताओं की नाराजगी के बाद स्थिति में बदलाव

पार्टी सूत्रों के मुताबिक टिकट वितरण से कई नेताओं की नाराजगी के बाद स्थिति में बदलाव आना शुरू हुआ। स्थिति संभालने के लिए संगठन महासचिव रामलाल को मोर्चे पर लगाया गया।

इसी बीच, राजपूत बिरादरी के वीरभद्र सिंह के खिलाफ इसी बिरादरी के चेहरे को आगे न करने या ब्राह्मण बिरादरी की चुनाव बाद ताजपोशी का संदेश जाने से ताकतवर राजपूत बिरादरी के कांग्रेस के पक्ष में जाने की संभावना बनती दिखी। फिर आलाकमान को धूमल खेमे से भी नुकसान की आशंका थी। इसी के मद्देनजर आनन-फानन में धूमल के नाम पर मुहर लगाने की योजना बनी।

लागू होगा आनंदी बेन फॉर्मूला
धूमल अगर राज्य के मुख्यमंत्री बनते हैं तो उन पर भी आनंदी बेन फॉर्मूला लागू किया जा सकता है। दरअसल धूमल अगले साल अप्रैल में 74 वर्ष के हो जाएंगे। पार्टी ने 75 वर्ष या इससे ऊपर के आयु के नेताओं को पद न देने का अघोषित नियम बनाया है। इसी नियम के तहत आनंदीबेन को गुजरात की कुर्सी छोड़नी पड़ी, जबकि केंद्रीय मंत्रिमंडल से नजमा हेपतुल्ला, कलराज मिश्रा की विदाई हुई। पार्टी सूत्रों का कहना है कि तब धूमल के सामने उनके सांसद पुत्र को महत्वपूर्ण पद देने का प्रस्ताव कर पद से इस्तीफा देने के लिए कहा जा सकता है। ऐसी स्थिति में नड्डा के नाम की लॉटरी बाद में निकल सकती है। कर्नाटक में 74 वर्षीय बीएस येदियुरप्पा के साथ भी यही फॉर्मूला अपनाए जाने की चर्चा है।
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