पांच साल के बाद एक बार फिर सत्ता की बागडोर किसे सौंपनी है, इसकी अहम जिम्मेदारी जनता के हाथ में है। 29 दिन तक चले प्रचार में सियासी दलों के वादे, घोषणाओं और आश्वासन सामने आए हैं। अब तय जनता को ही करना है कि कौन से दलीय या निर्दलीय प्रत्याशी इन वायदों पर खरा उतरने की क्षमता रखते हैं।
9 नवंबर को होने वाले मतदान के साथ मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह, नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार धूमल, जीएस बाली, सुधीर शर्मा, मुकेश अग्निहोत्री समेत अन्य क्षत्रपों का भाग्य ईवीएम मशीनों में कैद हो जाएगा।
यह देखना भी रोचक होगा कि दोनों प्रमुख दलों के दो दर्जन नए चेहरे सदन की दहलीज लांघ पाते हैं या नहीं। वहीं, बुटेल, कौल सिंह और वीरभद्र परिवार की अगली पीढ़ी सियासी सीढ़ी पर आगे बढ़ती है या नहीं, यह भी तय हो जाएगा।
हिमाचल के सियासी समर में इस बार कई दिग्गजों की साख दांव पर लगी है। वीरवार शाम पांच बजे तक होने वाले मतदान के 18 दिसंबर को नतीजे आएंगे। सरकार पर कुहासा छंटने के साथ ही कई क्षत्रपों का भविष्य भी तय होना है। मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार धूमल और वीरभद्र की जीत हार के साथ ही उनके पार्टी प्रत्याशियों का अंक गणित टिका है।
ऐसे प्रत्याशियों की लंबी सूची है, जिनके लिए चुनाव जीवन-मरण का सवाल बन गया है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह खुद शह और मात के खेल में फंसे हैं। 55 वर्ष लंबी सियासी पारी में 6 बार मुख्यमंत्री रहे वीरभद्र पहली बार शिमला जिले से बाहर निकल कर सोलन के अर्की से चुनाव लड़ रहे हैं।
वीरभद्र के अनुभव और राजनीतिक कौशल से कांग्रेस मुकाबले में है, लेकिन खुद को साबित करने की चुनौती में पासिंग मार्क्स से गुजारा नहीं चलेगा। उनके लिए बहुमत का जादुई आंकड़ा ही असल जीत होगी।
18 दिसंबर के नतीजे तय करेंगे कई क्षत्रपों का कद
वीरभद्र के सामने तीसरी बड़ी चुनौती अपने बेटे विक्रमादित्य की विधानसभा में एंट्री करवाने की है। इसी स्थिति में कांग्रेस दिग्गज कौल सिंह भी हैं, जिनका सियासी कद अपनी जीत हार नहीं, बल्कि बेटी चंपा के चुनावी नतीजे से तय होगा। कांगड़ा में कांग्रेस के दिग्गज जीएस बाली दो दशकों से जीत रहे हैं। यह सिलसिला बरकरार रखने से ही उनका सियासी वजूद तय होगा।
हरोली में मुकेश अग्निहोत्री और धर्मशाला में सुधीर शर्मा कांग्रेस के भविष्य की सियासत में अपना कद कितना बढ़ाते हैं, ये नतीजे तय करेंगे। कांग्रेस के क्षत्रपों से अलग भाजपा में प्रदेश के कई दिग्गजों के साथ प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष शाह की साख भी इस चुनाव से जुड़ गई है। मोदी और शाह का प्रेम कुमार धूमल को आखिरी समय में मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करना कितना कारगर रहा, यह नतीजों के बाद साबित होगा।
कांगड़ा में मोदी की तीन रैलियां उस जिले में मतदाताओं को कितना रिझा पाईं, ये वहां से पार्टी के खाते में आने वाली सीटों से साबित होगा। लगभग 19 केंद्रीय नेताओं और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चुनावी समर में उतारने वाली इस पार्टी के चुनाव प्रबंधन का मतदान के दिन फाइनल टेस्ट है।
हाईकमान और केंद्रीय नेतृत्व की पसंद वाले उम्मीदवारों के सामने खड़ी बागियों की चुनौती में कितना दम है ये भी नतीजे बताएंगे। बागियों के अलावा अपने बूते निर्दलीय ताल ठोक रहे प्रत्याशियों का भविष्य ईवीएम में बंद हो जाएगा।
इसके अलावा दोनों दलों के प्रदेश अध्यक्षों सतपाल सिंह सत्ती और सुखविंद्र सिंह सुक्खू के सामने अपना सियासी वजूद बचाने की चुनौती है। संगठन के साथ ग्राउंड पर उनकी पकड़ ही उनकी पार्टी में भविष्य तय कर सकती है।