डॉ. वाईएस परमार की विरासत संभालने वाले चेतन परमार ने अपनी राजनीतिक राह बदल दी है। टिकट नहीं मिलने से नाराज परमार खानदान के राजनीतिक उत्तराधिकारी का भाजपा में जाना राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का विषय बन गया है।
डॉ. परमार 1952 में प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने। 1956 में वे संसद सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। 1963 में दोबारा प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। ताउम्र वह कांग्रेस पार्टी में रहे। उनके बाद उनके पुत्र कुश परमार ने राजनीतिक विरासत संभाली।
सिरमौर में आठ चुनाव लड़े और पांच बार विधायक भी बन गए। लेकिन, अब चेतन परमार ने भाजपा का दामन थाम लिया है। चेतन परमार के पिता एवं प्रथम मुख्यमंत्री के बेटे कुश परमार ने भी अपने बेटे के फैसले को उचित ठहराया है।
पूर्व विधायक कुश परमार ने कहा कि उनके पिता के नाम को मान सम्मान मिलना चाहिए था, उसमें कांग्रेस की तरफ से कमी रही है। उन्होंने अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी बेटे को सौंप दी है। उनका बेटा बड़ा हो गया है। उन्होंने जो फैसला लिया वह सोच समझ कर ही लिया है। वह इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकते।