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कभी जिसके नाम से चलती थी कांग्रेस, पोते ने उसी पार्टी को कह दिया अलविदा

Fri, 27 Oct 2017 09:57 AM IST
संजय भारद्वाज/अमर उजाला, नाहन (सिरमौर)
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डॉ. वाईएस परमार की विरासत संभालने वाले चेतन परमार ने अपनी राजनीतिक राह बदल दी है। टिकट नहीं मिलने से नाराज परमार खानदान के राजनीतिक उत्तराधिकारी का भाजपा में जाना राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का विषय बन गया है। 
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डॉ. परमार 1952 में प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने। 1956 में वे संसद सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। 1963 में दोबारा प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। ताउम्र वह कांग्रेस पार्टी में रहे। उनके बाद उनके पुत्र कुश परमार ने राजनीतिक विरासत संभाली। 

सिरमौर में आठ चुनाव लड़े और पांच बार विधायक भी बन गए। लेकिन, अब चेतन परमार ने भाजपा का दामन थाम लिया है। चेतन परमार के पिता एवं प्रथम मुख्यमंत्री के बेटे कुश परमार ने भी अपने बेटे के फैसले को उचित ठहराया है। 
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पूर्व विधायक कुश परमार ने कहा कि उनके पिता के नाम को मान सम्मान मिलना चाहिए था, उसमें कांग्रेस की तरफ से कमी रही है। उन्होंने अपनी राजनीतिक जिम्मेदारी बेटे को सौंप दी है। उनका बेटा बड़ा हो गया है। उन्होंने जो फैसला लिया वह सोच समझ कर ही लिया है। वह इससे ज्यादा कुछ नहीं कह सकते।
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परमार ने हिमाचल के गठन में निभाई अहम भूमिका

डॉ. परमार का जन्म 4 अगस्त 1906 को चन्हालग गांव में हुआ। डॉ. परमार 1930 से 1937 तक सिरमौर रियासत के सब जज और 1941 में सिरमौर रियासत के सेशन जज रहे। 1943 में उन्होंने इस पद से इस्तीफा दे दिया। 1946 में डॉ. परमार हिमाचल हिल्स स्टेटस रिजनल कॉउंसिल के प्रधान चुने गए।

1947 में ग्रुपिंग एंड अमलेमेशन कमेटी के सदस्य और प्रजामंडल सिरमौर के प्रधान रहे। उन्होंने सुकेत आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1948 से 1950 तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे।

1950 में हिमाचल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। अपने सक्षम नेतृत्व के बल पर 31 रियासतों को समाप्त कर हिमाचल राज्य की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 
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