विधानसभा चुनाव के नतीजे आने को अब एक दिन ही शेष है। ऐसे में प्रदेश की नजर एक बार फिर सर्वाधिक सीटों वाले कांगड़ा जिले पर टिकी हैं। कांगड़ा से होकर सत्ता का रास्ता जाने का जुमला राजनीतिक दलों की धड़कने बढ़ा रहा है।
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भाजपा को पिछले चुनाव में बिना कांगड़ा के सरकार बनाने के दांव से सत्ता गंवानी पड़ी थी। इसी से सबक लेकर दोनों प्रमुख दलों ने इस जिले में पूरी ताकत झोंक दी। कांगड़ा में जिसका पलड़ा भारी रहेगा सत्ता उस ओर ही झुकेगी।
कांगड़ा की 15 विधानसभा सीटों के बाद 10 सीटों वाले दूसरे बड़े जिले मंडी में बड़े उलटफेर की संभावना है। दोनों जिलों के अलावा कांग्रेस का गढ़ कहे जाने वाले शिमला जिले पर भी जीत हार के अंतर का दारोमदार है। इन तीन जिलों की 33 विधानसभा सीटें हिमाचल में सरकार तय करती रही हैं, जिनमें कांगड़ा सबसे अहम है।
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पीएम मोदी ने इस जिले ही झोंकी ज्यादा ताकत
विधानसभा चुनाव के दौरान जिस तरह से भाजपा और कांग्रेस ने कांगड़ा जिले को फोकस में रखा, उसका असर 18 दिसंबर को आने वाले नतीजों में दिखेगा। वर्ष 2012 में कांग्रेस ने सीटों के लिहाज से सबसे बड़े जिले से 10 सीटें जीतीं, जबकि भाजपा के खाते में तीन सीटें आईं और दो निर्दलियों ने जीत दर्ज की।
तत्कालीन प्रेम कुमार धूमल सरकार कांगड़ा में मिली करारी हार से सत्ता से बाहर हुई। इस बार भाजपा ने कांगड़ा के हिसाब से रणनीति बनाई। राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने हिमाचल चुनावों पर मंथन के लिए कांगड़ा के पालमपुर को चुना।
शाह ने पहली जनसभा भी कांगड़ा कस्बे में की। इतना ही नहीं टिकट आवंटन में भी कांगड़ा में सर्वाधिक उलटफेर हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांगड़ा में ही ज्यादा ताकत झोंकी।
वीरभद्र सिंह अकेले ही मोर्चे पर जूझते रहे
चुनाव प्रचार में मोदी की सात जनसभाओं में तीन कांगड़ा जिले में र्हुइं। वहीं, कांग्रेस प्रचार के फ्रंट पर पिछड़ गई। राहुल गांधी की तीन जनसभाएं प्रदेश में हुई जिसमें एक कांगड़ा के नगरोटा में करवाई गई। वीरभद्र सिंह अकेले ही मोर्चे पर जूझते दिखे।
जिले से पार्टी के तीन कैबिनेट मंत्री जीएस बाली, सुधीर शर्मा और सुजान सिंह पठानिया वीरभद्र सरकार में थे, लेकिन वे अपने हलकों में सिमटे रहे।
कांग्रेस के लिए इस जिले में राहत इतनी है कि यहां भाजपा को कई सीटों पर बगावत और भितरघात से जूझना पड़ा। इस जिले में यह देखना भी अहम रहेगा कि धूमल को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित होने से मतदाताओं के रुझान पर कैसा असर पड़ा है।
सुखराम के दांव का असर भी दिखेगा
मंडी जिला दोनों दलों के लिए वर्ष 2012 में बराबर रहा। दोनों के खाते में पांच पांच सीटें आईं। यहां भाजपा ने कांग्रेस को मात देने के लिए पंडित सुखराम के बेटे अनिल शर्मा को अपने पाले में कर लिया।
सुखराम के दांव का असर भी सोमवार को दिखेगा। वहीं कांग्रेस को इस जिले में बिना सुखराम के उतरना पड़ा है।
हालांकि मंत्री कौल सिंह ठाकुर का कद इस चुनाव में बढ़ाकर कांग्रेस ने उसकी भरपाई करने की कोशिश जरूर की है। कौल की बेटी चंपा को सुखराम के बेटे अनिल के सामने उतार कर पार्टी ने उलटफेर की कोशिश की है।
जिला शिमला को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। पिछले चुनाव में भाजपा यहां केवल एक सीट शिमला शहर ही जीत पाई थी। इसके अलावा एक निर्दलीय जीता जबकि 6 सीटें कांग्रेस के खाते में आईं। इस बार कांग्रेस की व्यूह रचना तोड़ने को भाजपा ने पूरी ताकत झोंकी है।
पहली बार वीरभद्र सिंह ने शिमला जिला छोड़ सोलन जिले का रुख किया। हालांकि उनकी सीट शिमला ग्रामीण से बेटा विक्रमादित्य मैदान में है। भाजपा ने यहां टिकटों में भारी फेरबदल किया।
मुख्यमंत्री के बेटे के खिलाफ उनके करीबी प्रमोद शर्मा को उतार दिया। कांग्रेस जिले की आठ सीटों पर वीरभद्र सिंह के सियासी रुतबे के भरोसे है, जबकि भाजपा गुड़िया प्रकरण, टिकट आवंटन में उलटफेर से लेकर मोदी लहर से कमल खिलने की उम्मीद लगा रही है।
वर्ष 2012
जिला कांग्रेस भाजपा अन्य
कांगड़ा 10 3 2
मंडी 5 5 -
शिमला 6 1 1