सरकारी नीति के तहत सेवानिवृत्ति आयु पूरी कर चुके शिक्षकों को यदि वे 31 मार्च 2026 तक सेवाएं देते हैं, तो उन्हें वेतन का 50 फीसदी मानदेय दिए जाने का प्रावधान है। इसी व्यवस्था के तहत कई शिक्षकों ने शैक्षणिक सत्र के बीच छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए सेवानिवृत्ति नहीं ली और सेवा विस्तार स्वीकार किया। लेकिन अब वही शिक्षक आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। सितंबर 2025 के बाद से सेवाविस्तार पर तैनात शिक्षकों को भुगतान नहीं हो पाया है। कई शिक्षकों ने विभागीय स्तर पर गुहार लगाई, मगर फाइलें नियमों और मंजूरियों के बीच उलझी हुई हैं।
शिक्षकों का आरोप है कि सरकार ने नीति तो बना दी, लेकिन उसके वित्तीय और प्रशासनिक प्रबंधन की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की। सरकार ने यह व्यवस्था इसलिए लागू की थी ताकि शैक्षणिक सत्र के बीच शिक्षकों की सेवानिवृत्ति से स्कूलों में पढ़ाई बाधित न हो। इसी कारण 31 मार्च 2026 को ही सामूहिक सेवानिवृत्ति का फैसला किया गया। मगर जमीनी हकीकत यह है कि जिन शिक्षकों ने इस नीति पर भरोसा किया, वे आज बिना मानदेय काम करने को मजबूर हैं। नियमों के मुताबिक, सेवानिवृत्ति लेने के इच्छुक शिक्षकों को निर्धारित तिथि से कम से कम दो माह पहले विभाग को लिखित सूचना देना अनिवार्य है। कई शिक्षक इस बाध्यता के कारण भी समय रहते फैसला नहीं बदल पा रहे हैं। ऐसे में वे न तो बीच सत्र में सेवानिवृत्ति ले सकते हैं और न ही उन्हें मानदेय मिल रहा है।