प्रदेश हाईकोर्ट ने आपदा प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास और कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) फंड के आवंटन में भारी असंतुलन पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारें एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर अपने वैधानिक दायित्वों से नहीं बच सकतीं। अदालत ने कहा कि आपदा के बाद राहत और पुनर्वास कार्यों के लिए संसाधन जुटाना और कानून के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करना सरकारों की जिम्मेदारी है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135 (5) के तहत कंपनियों के लिए उन स्थानीय क्षेत्रों को प्राथमिकता देना अनिवार्य है, जहां वे काम करती हैं।
अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को आदेशों के अनुपालन और गैर अनुपालनकर्ता कंपनियों पर कार्रवाई के लिए उठाए कदमों का ब्योरा देते हुए नया हलफनामा दायर करने का आदेश दिया। अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी। हाईकोर्ट ने एनटीपीसी, एनएचपीसी, एसजेवीएन, पावर ग्रिड, पीएफसी, आरईसी, टीएचडीसी, एनईईपीसीओ, ग्रिड इंडिया और एनएचएआई जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की ओर से हिमाचल प्रदेश को अपेक्षाकृत कम सीएसआर फंड दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। अदालत के समक्ष रखे आंकड़ों के अनुसार एनटीपीसी ने वित्तीय वर्ष 2022-23 में हिमाचल को केवल 1.58 करोड़ और साल 2023-24 में 2.22 करोड़ सीएसआर मद में दिए। इसके विपरीत वर्ष 2023-24 में उत्तर प्रदेश को 40.16 करोड़, बिहार को 24.10 करोड़, महाराष्ट्र को 29.87 करोड़, ओडिशा को 18.83 करोड़ और छत्तीसगढ़ को 17.07 करोड़ रुपये प्रदान किए गए। खंडपीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, लद्दाख, पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों को दी गई राशि नाममात्र की है, जो कानून की भावना और प्रावधानों के अनुरूप नहीं दिखती।