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एक ही वंश के लोग, उत्तराखंड में एसटी, हिमाचल में नहीं

Fri, 09 Dec 2016 10:33 AM IST
बविंद्र वशिष्ठ/अमर उजाला, शरली (शिलाई)
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गिरिपार क्षेत्र में दुर्गम पहाड़ पर उत्तराखंड की सीमा से सटा एक छोटा सा गांव है शरली। बीच में टौंस नदी और सामने है उत्तराखंड की जोंसार बाबर क्षेत्र का सुमोग गांव। दोनों ही गांवों के लोगों की बोली, पहनावा, रीति-रिवाज, रहन-सहन, खान-पान, परंपराएं और जीवन स्तर एक जैसा है।
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इन दोनों ही गांवों के लोगों का कुल (वंश) भी एक ही है। आज भी दोनों में दाईचारा और भाईचारा है। यह दो गांवों की कहानी नहीं है। जोंसार बाबर और शिलाई समेत गिरिपार क्षेत्र के सैकड़ों गांवों के लोगों का आपस में ऐसा ही बंधन है।

टौंस नदी के उस पार जोंसारा समुदाय को एसटी का दर्जा है और इस पार हाटी समुदाय जनजातीय दर्जे के लिए करीब 49 साल से संघर्ष कर रहा है, लेकिन अब तक कोई नतीजा नहीं निकला। सिरमौर के गिरिपार क्षेत्र की 127 पंचायतों में करीब पौने तीन लाख आबादी हाटी समुदाय की है।
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हाटी समुदाय की लोक संस्कृति, मेले, त्योहार, धार्मिक मान्यताएं और सामाजिक व आर्थिक पिछड़ापन साथ लगते उत्तराखंड के जोंसार बाबर जोंसारा समुदाय से एकदम मिलता-जुलता है। हाटी और जोंसारा समुदाय एक ही वंश के हैं।

इन दोनों समुदायों में आज भी दाईचारा है। यानी दोनों आज भी आपस में खून का रिश्ता मानते हैं। यही वजह है कि वे आपस में शादियां नहीं करते हैं। आजादी से पहले उत्तराखंड का जोंसार बाबर क्षेत्र 1933 तक सिरमौर रियासत का ही एक भाग था।
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1967 से अब तक अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हाटी लोग

1967 में भारत सरकार ने इसे जनजातीय क्षेत्र घोषित कर दिया। तमाम समानताओं और संघर्ष के बावजूद गिरिपार क्षेत्र के लोगों को अब जनजातीय दर्जा नहीं मिल पाया। नतीजतन, यहां के लोग उन अधिकारों से वंचित रह गए जो उन्हें जनजातीय क्षेत्र होने के कारण मिलने चाहिए थे।

केंद्रीय हाटी समिति के महासचिव कुंदन सिंह शास्त्री का कहना है कि उत्तराखंड के जोंसार बाबर और गिरिपार के सैकड़ों गांवों में आज भी दाईचारा है। खास आयोजनों पर टौंस के उस पार से दाई-भाइयों को विशेष तौर पर बुलाया जाता है।

जोंसार बाबर के लोग भी गिरिपार के लोगों को अपने यहां इसी तरह से बुलाते हैं। सांस्कृतिक, भौगोलिक समानताओं और कुलवंश के आधार पर गिरिपार के लोग जोंसार बाबर की तर्ज पर जनजातीय दर्जे के लिए मांग कर रहे हैं।

शिलाई कॉलेज के  प्राचार्य और क्षेत्र की संस्कृति के जानकार प्रोफेसर टीआर पराशर कहते हैं कि जोंसारा और हाटी समुदाय में कुलवंश का रिश्ता एक ऐतिहासिक तथ्य है। गिरिपार और जोंसार बाबर क्षेत्र के गांवों के नाम भी मिलते-जुलते हैं। गिरिपार को एसटी का दर्जा देकर पिछड़े हाटी समुदाय को न्याय मिलना चाहिए।

शिलाई कॉलेज में ही इतिहास के प्रवक्ता बीआर ठाकुर कहते हैं कि हाटी समुदाय सांस्कृतिक, धार्मिक और परंपरागत विरासत को महफूज रखने के लिए भी गिरिपार को जनजातीय दर्जा मिलना जरूरी है। लोकुर कमीशन के मापदंडों पर भी गिरिपार क्षेत्र को एसटी दर्जे का दावा मजबूत है। अब हमें इसकी लड़ाई नए सिरे से शुरू करनी है।

क्या है हाटी समाज
गिरिपार क्षेत्र के लोग किसी समय अपनी फसलों को पीठ पर उठाकर एक साथ नजदीकी हाट में ले जाते थे और उन फसलों के बदले में वर्ष भर के लिए गुड़, सिरा, कपडे़, नमक ले आते थे। एक साथ हाट में सामान ले जाने वालों को बाहरी लोग उस दौरान हाटी कहते थे।

क्या है गिरिपार
हाटियों का गिरिपार क्षेत्र प्रदेश के अन्य भागों से अलग-थलग है। गिरि नदी इसे सिरमौर के अन्य भागों से नहीं शिमला और सोलन से भी अलग करती है। उत्तर में बर्फ से ढकी चूड़धार की चोटियां है और पूर्व में टौंस नदी इसे उत्तराखंड के जोंसार बाबर से विभाजित करती है।

जनजातीय घोषित होने पर यह फायदा
-गिरिपार के युवाओं को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिलेगा, रोजगार के नए द्वार खुलेंगे।
-केंद्र सरकार से विकास कार्यों के  लिए अतिरिक्त मदद मिलेगी।
-लुप्त होती जा रही हाटी लोक संस्कृति को नई पहचान मिलेगी।
-क्षेत्र के विद्यार्थियों को शिक्षण संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए आर्थिक मदद मिलेगी।
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