कहते हैं कि हाथ की लकीरें तकदीर बनाती और बिगाड़ती हैं, लेकिन किसी के हाथ ही न हों तो उसकी किस्मत कौन लिखे। हमीरपुर जिले के छोटे से गांव नौहंगी के रहने वाले राजेश कुमार की कहानी कुछ ऐसी ही है।
बचपन से दोनों हाथों से महरूम राजेश की कुछ कर गुजरने की ऐसी लगन थी कि उसने अपने पैरों से ही अपनी तकदीर लिख डाली। 1987 में जन्मे राजेश कुमार को जब यह समझ आया कि उसके हाथ नहीं हैं तो पैरों से लिखने की शुरुआत की।
मुश्किलें आने के बावजूद सरकारी स्कूल से मैट्रिक की पढ़ाई की। बिना किसी की मदद लिए पैरों की अंगुलियों में पेन फंसाकर पेपर दिए। कामयाबी भी हासिल की।