हिमाचल में साधु-संत और धार्मिक संस्थाओं को दान में मिली जमीन बेचने का अधिकार देने को सरकार तैयार नहीं है। जयराम सरकार इस संबंध में पूर्व कांग्रेस सरकार की ओर से विस चुनाव से पहले लिए फैसले को पलटने की तैयारी में है। वीरभद्र सरकार ने धार्मिक संस्थाओं को दान में मिली भूमि बेचने का अधिकार देने के लिए एक्ट में संशोधन करने का फैसला ले लिया था। इसके लिए कैबिनेट ने मंजूरी भी दे दी थी। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद अब भाजपा सरकार ने इसकी प्रक्रिया फिलहाल रोक दी है। सरकार धार्मिक संस्थाओं को यह छूट देने के मूड में नहीं है। सूबे में धार्मिक संस्थाओं के पास दान में मिली हजारों बीघा जमीन है।
हिमाचल प्रदेश में सीलिंग एक्ट के तहत लोग 150 बीघा तक ही जमीन रख सकते हैं। जनजातीय क्षेत्रों में लोग इससे 25 से 30 फीसदी तक ज्यादा जमीन रख सकते हैं। यह जमीन गैर मुमकिन और आबादी वाली जमीन के अतिरिक्त होगी। धार्मिक संस्थाओं के लिए प्रदेश सरकार ने इसमें छूट दी है। संस्थाओं की दलील है कि उनके अनुयायी उन्हें और जमीनें दान में देना चाहते हैं, ऐसे में इस सीलिंग एक्ट में उन्हें छूट दी जाए। इसके बाद प्रदेश सरकार ने सीलिंग एक्ट में संशोधन कर संस्थाओं को डेढ़ सौ से ज्यादा बीघा जमीन दान में लेने की अनुमति दे दी थी, लेकिन इस जमीन को बेचने का उन्हें अधिकार नहीं दिया था।
अब ये धार्मिक संस्थाएं दान में मिली जमीन बेचने का अधिकार मांग रही हैं। तर्क दिया जा रहा है कि अनुयायियों ने उन्हें जो जमीनें दान में दी हैं, वे एक जगह पर नहीं हैं, बल्कि छोटे-छोटे टुकड़ों में हैं। इसलिए इस भूमि का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। संस्थाएं इन छोटी-छोटी जमीनों को बेचकर कहीं ऐसी जगह पर जमीन खरीदना चाहती हैं, जहां लोगों के लिए आश्रम बनाए जा सकें। इस दलील को पूर्व कांग्रेस सरकार ने स्वीकार कर धार्मिक संस्थाओं को जमीन बेचने का अधिकार देने के लिए एक्ट में संशोधन करने की अनुमति दे दी थी, लेकिन एक्ट में संशोधन नहीं हो सका था। अब जयराम सरकार इस प्रक्रिया पर विराम लगाने की तैयारी में है।
ये हैं प्रावधान
सीलिंग एक्ट के तहत लोग 150 बीघा और जनजातीय इलाकों में इससे 25 से 30 फीसदी जमीन ज्यादा रख सकते हैं। यह जमीन गैर मुमकिन और आबादी वाली जमीन के अतिरिक्त है। साधु-संतों और धार्मिक संस्थाओं को इसमें छूट है। वे 150 बीघा से ज्यादा जमीन रख सकते हैं, लेकिन जमीन बेच नहीं सकते।