23 जून 1943 को नारकंडा के पास हाटू के जंगल में धुंध की वजह से अंग्रेज वायसरॉय लिनलिथगो क्रांतिकारियों के निशाने से बच गए थे। रोहडू़ के क्रांतिकारी सत्यदेव बुशहरी और कोटगढ़ के फौजी शिवराम ठाकुर को क्रांतिकारियों ने वायसरॉय को मारने के लिए तैनात किया था। वे हाटू के जंगल में वायसरॉय के गुजरने के संभावित स्थान पर घात लगाए निशाना साधे थे।
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जब वायसरॉय का काफिला जंगल से गुजरा तो धुंध छा गई। निशाना न सध पाया और दोनों क्रांतिकारियों को निराश लौटना पड़ा। सत्यदेव बुशहरी और शिवराम ठाकुर ने वायसरॉय को मारने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। वायसरॉय ने पब्बर नदी में ट्राउट मछली के शिकार के लिए जाना था।
आजादी की लड़ाई के लिए हिमाचल में गुरिल्ला बम बने। सशस्त्र क्रांतियां हुईं। हजारों क्रांतिकारियों ने पूरे दमखम से स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी। सन 1857 की महाक्रांति हो या 15 अगस्त 1947 तक का आंदोलन। हिमाचल की इनमें अहम भागीदारी रही। आजादी की महाक्रांति के बाद शिमला अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी बनी।
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ऐसे में अंग्रेजी शासकों के ठौर-ठिकानों के इर्द-गिर्द सूबे में जहां विभिन्न संघर्षों का दौर चला। हिमाचल में अंग्रेज सरकार के विरोध और रियासती राज के खिलाफ दोहरा विद्रोह देश के पूरी तरह से आजाद होने तक सुलगता रहा।
यहां से शुरू हुआ था 1857 का विद्रोह
हिमाचल के स्वतंत्रता सेनानी
शिमला, जतोग, धर्मशाला, रामपुर बुशहर, कसौली, कुल्लू जैसे कई क्षेत्रों में तो सशस्त्र क्रांतियां भी हुईं। विद्रोह की पहली चिंगारी कसौली सैनिक छावनी में भड़की। 20 अप्रैल 1857 में छह देशी सैनिकों ने कसौली में पुलिस चौकी में आग लगाई। तब कसौली की सैनिक छावनी ब्रिटिश सरकार की सैन्य शक्ति का प्रमुख पहाड़ी केंद्र था। कसौली, डगशाई, सुबाथू और जतोग छावनियों में भी सेना में विद्रोह की आग भड़क उठी। नालागढ़ का विद्रोह, सिरमौर में विप्लव, कांगड़ा क्षेत्र में क्रांति, कुल्लू-लाहौल में बगावत, चंबा में उपद्रव, मंडी-सुकेत में उपद्रव जैसी कई आंदोलन हुए।
1862 में सुकेत रियासत का जनांदोलन, 1883 में बिलासपुर का झुग्गा सत्याग्रह और 1895 में चंबा का किसान आंदोलन हुआ। फिर स्वाधीनता आंदोलन की जोरदार शुरुआत हिमाचल के देशभक्त बाबा लछमन दास आर्य ने 1905 में की। 1906 में लाला लाजपत राय ने मंडी आकर एक क्रांतिकारी संगठन बनाया। 1910 में ऊना के देशभक्त बाबा लछमन दास लाहौर जेल से रिहा होकर ऊना आए। 1914 के बाद हरदेव राम ने मंडी में भी गदर पार्टी की गतिविधियां तेज कीं।
क्रांतिकारी हरदेव को मंडी में भाई हिरदाराम मिले। भाई हिरदाराम बम बनाने की ट्रेनिंग ले चुके थे। हिरदा राम के बनाए बमों का प्रयोग अनेक गुरिल्ला हमलों में किया गया। फरवरी 1915 में भाई हिरदाराम के पास बम बरामद हुए। हिरदा राम को फांसी की सजा हुई। अपील पर उनकी फांसी की सजा कालापानी के आजीवन कारावास की सजा में बदल दी गई।
कांगड़ा से 1916 में बाबा कांशीराम स्वतंत्रता संग्राम में कूदे। 1917 में मंडी के क्रांतिकारी सिंधु खराड़ा को देशद्रोह के अपराध में सात साल की कैद हुई। 1918 में हमीरपुर के नादौन के निवासी युवा यशपाल और मंडी के बालमुंकुद भी क्रांतिकारी आंदोलन में सक्रिय रहे। 1920 में कांगड़ा में पंचम चंद्र कटोच, सर्वमित्र, बाशीराम, कृपाल सिंह, सिद्धू राम, थोहलो राम जैसे क्रांतिकारियों ने आजादी की लड़ाई लड़ी।
16 जुलाई 1939 में क्रांतिकारी भागमल सौहटा के नेतृत्व में क्रांतिकारियों पर धामी के हलोग में स्थानीय शासक के सेवकों और पुलिस ने पत्थर बरसाए और गोलियां चलाईं। गोलीकांड में दुर्गादास और उमादत्त शहीद हुए। नवंबर 1940 में कांगड़ा क्षेत्र में व्यक्तिगत सत्याग्रह समिति के प्रभारी ठाकुर हजारा सिंह, पंडित परसराम और ब्रह्मानंद ने कांगड़ा में भारी जनसभा के सामने गिरफ्तारियां दीं। 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन में प्रदेश भर में रैलियां निकलीं।
शिमला में भागमल सौहटा, पंडित हरिराम, चौधरी दीवानचंद, सालिगराम शर्मा, नंदलाल वर्मा, तुफेल अहमद, ओमप्रकाश चोपड़ा, संतराम, कामरेड देवीराम, हरिचंद आदि आंदोलनकारियों ने गिरफ्तारियां दीं। सत्यदेव बुशहरी, मनशाराम, महावीर सिंह, पदम सिंह, तुलसीराम आदि ने रेल की पटरियां उखाड़ीं, टेलीफोन की तारें काटीं, पानी के पंप उखाड़कर अंग्रेजों को परेशान किया। महात्मा गांधी और अन्य नेताओं के शिमला दौरों का भी खासा असर आंदोनकारियों पर रहा।
सितंबर 1943 में पझौता किसान आंदोलन में 69 क्रांतिकारी गिरफ्तार हुए। 52 आंदोलनकारियों को तो कालापानी के आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। 1943 में हिमाचल के कई क्षेत्रों में आंदोलन का जोरदार अभियान छिड़ा। ये सिलसिला आजादी मिलने तक जारी रहा। प्रदेश के राज्य भाषा एवं संस्कृति विभाग ने 2310 स्वतंत्रता सेनानियों पर सामग्री एकत्र की है। ये पुस्तक ‘हिमाचल प्रदेश के स्वतंत्रता सेनानी’ में प्रकाशित है।