उम्र 75 वर्ष के पार। चेहरे पर झुर्रियां। आंखें पथरा सी गई हैं। चेहरे पर कोई भाव नहीं। मानो सब शून्य हो चुका है। फॉरेस्ट गार्ड होशियार सिंह की मौत को करीब दस दिन बीत चुके हैं।
लेकिन, उसकी प्यारी दादी मां हिरदी देवी हर दिन घर की चौउड़ी (गैलरी) पर बैठकर अपने पोते हैप्पी (होशियार के बचपन का नाम) की राह ताकती रहती हैं। इस ख्याल से कि न जाने वह कब आएगा और उसे दादी मां कहकर गले लगा लेगा।
होशियार की दादी हिरदी देवी कतई मानने को तैयार नहीं कि उनका जिंदादिल पोता आत्महत्या कर सकता है। वह कहती हैं - बचपन से ही अपने बूते जिंदगी जी थी मेरे पोते ने। वो भला जान क्यों देगा? आत्महत्या नहीं, मेरे दिलेर को हत्यारों ने धोखे से मारा होगा।
मेरा पोता हार मानने वालों में से नहीं था। अंतिम बार फोन पर बात कर कुथाह मेेले में जाने की बात कह रहा था। हर वर्ष मेले से कुछ न कुछ मेरे लिए लाता था। आज खुद ही चला गया है। न वो आया, न मेले से कुछ लाया।
हत्यारों को उसी पेड़ से लटकाओ
दादी ने कहा कि हत्यारों को उसी पेड़ पर लटका दो, जहां होशियार लटका था ताकि किसी के कलेजे का टुकड़ा फिर ऐसे न तड़पे। सरकार.... वन माफिया को सूली चढ़ा दो। दादी इतना कहते-कहते खामोश हो जाती हैं तो होशियार की बुआ मोहनी ने कहा कि हर दिन मां घर की चौउड़ी पर बैठकर घंटों यूं ही रास्ते को ताकती हैं।