देश में लुप्त हो रही बांसुरी की धुनों को संजीवनी देने के लिए महाविद्यालय में वाद्य संगीत विषय में बांसुरी को जोड़ना आवश्यक है। देश-विदेशों में बांसुरी सम्राट के नाम से विख्यात उस्ताद मुजतबा हुसैन ने कहा कि बांसुरी वादन में बहुत से लोग अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं।
लेकिन, संसाधानों की कमी से अभी बांसुरी वादन लोक धुनों और सुगम संगीत तक सीमित रह गया है। यदि बांसुरी वादन को शास्त्रीय संगीत से जोड़ा जाएगा, तो इससे न केवल बांसुरी का संरक्षण होगा। बल्कि बांसुरी वादन के क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को भी सहयोग मिलेगा।
बांसुरी वादन को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अभियान छेड़ा है। हुसैन ने राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला (छात्रा) की संगीत विषय की छात्राओं से मिलकर उनको संगीत के टिप्स भी दिए।
मुजतबा हुसैन ने इंटरनेशनल रोटरी क्लब महाराष्ट्रा के बेटी-बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान के लिए 2015 में चैरिटी शो किया। इसमें 18 लाख रुपये चैरिटी एकत्रित हुई। बांसुरी वादन से इतनी चैरिटी एकत्रित होने पर संगीत निदेशक उत्तम सिंह ने उन्हें बांसुरी सम्राट का अवार्ड दिया।
भगवान की जिंदगी में भी था संगीत का अहम रोल
उस्ताद मुजतबा हुसैन देश के पहले मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति हैं, जिन्होंने बांसुरी वादन को चुना है। हुसैन कहते हैं कि हिंदु संस्कृति में जब भी हम भगवान के चित्रों को देखते हैं, तो उसमें किसी न किसी हाथ में वाद्य यंत्र जरुर दिखाई देगा।
यह इस बात का प्रतीक है कि संगीत का भगवान की जिंदगी में भी अहम रोल रहा है। इसलिए जरुरी नहीं कि पेशे के तौर पर ही संगीत को सीखा जाए। अपने आनंद के लिए भी संगीत आवश्यक है।