से होता है आगाज
डोलरू जाति के लोग घर-घर जाकर सुनाते हैं गीत
संवाद न्यूज एजेंसी
जुन्गा (शिमला)। भारतीय पुरातन पद्धति के अनुसार हिंदू नववर्ष अर्थात विक्रम संवत का शुभारंभ शनिवार को चैत्रमास की संक्रांति से हो गया। क्योंथल क्षेत्र में इस संक्रांति को बीशूड़ी अर्थात छोटी बैशाख साजी के रूप में मनाते हैं। गिरिगंगा घाटी के दोनों ओर शिमला तथा सिरमौर जिले के क्षेत्रों में चैत्र मास का नाम गंधर्व समुदाय के मुखारविंद से सुनना शुभ मानते हैं।
यह परंपरा बदलते परिवेश में आज भी विद्यमान है। इन क्षेत्रों में गंधर्व समुदाय के लोग आदिकाल से इस परंपरा को निभाते आ रहे हैं। त्रिगर्त क्षेत्र में डोलरू नामक जाति के लोग घर-घर जाकर नववर्ष चैत्र माह का नाम गीत के माध्यम से सुनाते हैं। नववर्ष पर लोग खुशी-खुशी इन्हें दान के रूप में आटा, चावल, घी और सुहागियां भेंट करते हैं। प्रदेश के जाने माने साहित्यकार एवं पद्मश्री विद्यानंद सरैक ने विशेष बातचीत में बताया कि चैत्र मास का धार्मिक ग्रंथों में विशेष महत्व है।
चित्रा नक्षत्र के नाम पर चैत्रमास का नाम दिया है। चैत्र मास में आने वाले नवरात्र का विशेष महत्व है, नवरात्र प्रतिपदा को विक्रमी संवत का आरंभ होता है, इसी दिन युधिष्ठर का राज्य अभिषेक और सिखों के दूसरे गुरु अंगद देव का जन्म हुआ था। शास्त्रोक्त मान्यता के अनुसार चैत्र प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की थी। सरैक का कहना है कि चैत्र मास की संक्रांति जिसे बीशूड़ी कहा जाता है, इस दिन से हिंदू धर्म में नववर्ष का आगाज होता है। उन्होंने बताया कि गंधर्व समुदाय के लोग सुबह स्थानीय मंदिर में जाकर बेउल बजाकर देवता को नववर्ष की बधाई देते हैं। इसके बाद इस वर्ग के लोग अपने क्षेत्राधिकार में घर-घर जाकर लोगों को चैत्र मास का नाम विशेष गीत के माध्यम से सुनाते हैं और यह प्रक्रिया पूरे माह बैसाखी अर्थात बीशू की संक्रांति तक चलती है।