खांसी ही नहीं, शरीर के किसी हिस्से में अगर गिल्टी है और उसमें सूजन है तो यह भी टीबी का संकेत हो सकता है। इसके साथ ही बुखार आना, अचानक वजन कम होना, भूख न लगना और रात में पसीना आना भी टीबी के लक्षण हैं।
हिमाचल प्रदेश में फेफड़ों के क्षय रोग के बाद दूसरे नंबर पर गिल्टियों (लिंफ नोड्स) में टीबी के मामले सामने आ रहे हैं। कान और हड्डियों की टीबी के मरीज भी मिल रहे हैं। हालांकि शरीर के इन हिस्सों में क्षय रोग के मामले काफी कम हैं। प्रदेश में टीबी के सबसे अधिक 60 फीसदी मामले फेफड़ों से जुड़े हैं, जबकि 10 फीसदी मामले गिल्टियों की टीबी के हैं। इन मामलों का उपचार प्रदेश के विभिन्न अस्पतालों में चल रहा है।
इसके अतिरिक्त शेष 40 फीसदी मामले शरीर के अलग-अलग अंगों जैसे स्किन (त्वचा), लिवर, आंत, बच्चेदानी और किडनी आदि में बंटे हुए हैं। स्वास्थ्य विभाग अब सभी प्रकार के क्षय रोग को लेकर लोगों को जागरूक कर रहा है। चिकित्सकों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति फेफड़ों की टीबी से ग्रसित मरीज के संपर्क में आता है, तो उसे फेफड़ों के साथ-साथ शरीर के अन्य हिस्सों में भी क्षय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। चिकित्सकों ने सलाह दी है कि शरीर में होने वाले किसी भी असामान्य लक्षण को नजरअंदाज न करें और समय पर जांच करवाएं।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, क्षय रोग केवल फेफड़ों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह नाखून और बालों को छोड़कर शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है।
कान के पिछले हिस्से के जख्म को न करें नजरअंदाज
कान के पिछले हिस्से में अगर जख्म हो और उससे पानी बहता हो तो यह टीबी का लक्षण हो सकता है। इसकी जांच करवानी चाहिए। राहत की बात यह है कि शिमला जिले में क्षय रोग के मामले लगातार घट रहे हैं। वर्ष 2024 में जहां टीबी के 1,703 मामले दर्ज थे, वहीं वर्ष 2025 में यह संख्या घटकर 1,461 रह गई। जिले में क्षय रोग के मामलों का शीघ्र पता लगाना, समय पर उपचार शुरू करना, रोगियों की बारीकी से निगरानी और टीबी निवारक उपचार (टीपीटी) की वजह से यह दर लगातार कम हो रही है।
क्षय रोग के मामलों में लगातार गिरावट आ रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि तपेदिक निवारक उपचार (टीपीटी) एक ऐसी दवा प्रक्रिया (रेजिमेन) है, जो टीबी संक्रमण से पीड़ित व्यक्तियों के संक्रमण को सक्रिय टीबी बीमारी में बदलने से रोकने के लिए दी जाती है। -डॉ. यशपाल रांटा, मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) शिमला