नमी की कमी से जड़ों में पड़ रहीं दरारें, फंगस का हमला शुरू
ठियोग, रोहड़ू और कुमारसैन के बगीचों में देखे जा रहे रोग के लक्षण, बागवान परेशान
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। जिले में तीन महीनों से बारिश और बर्फबारी न होने के कारण सूखे जैसे हालात बन गए हैं। इसके चलते सेब के बगीचों में रूट कैंकर रोग का प्रकोप दिखना शुरू हो गया है।
ठियोग, रोहड़ू और कुमारसैन सहित अन्य क्षेत्रों में इसके लक्षण सामने आए हैं। यह रोग सेब के पेड़ों को बुरी तरह नुकसान पहुंचा रहा है। नमी की कमी के कारण जड़ों में दरारें पड़ रही हैं और फंगस का हमला शुरू हो गया है। इससे बागवानों को सेब की पैदावार प्रभावित होने की चिंता सताने लगी है।
इसके अलावा वूली एफिड, रिंग वॉर्म और स्केल समेत कई तरह के कीटों का असर भी बगीचों में दिखने लगा है। वहीं दूसरी ओर नया पौधरोपण का काम भी अटक गया है। इसके अलावा बागवान तौलिये भी नहीं बना पा रहे हैं। रोहड़ू के बागवान ओम प्रकाश ने बताया कि इससे सेब के पौधे की बढ़ोतरी रुक गई है। स्केल रोग से भी पौधे मर रहे हैं। स्केल की बीमारी फलों को भी नुकसान पहुंचाती है। वूली एफिड भी सेब के बगीचों से हटने का नाम नहीं ले रहा है और यह पौधों को नुकसान पहुंचा रहा है। पहले अच्छी बर्फबारी होने पर ये कीट और रोग सर्दियों में पनप नहीं पाते थे।
अभी पौधों से छेड़छाड़ न करें : उषा
जिले की सूखी जगहों पर कैंकर रोग की समस्या अधिक देखने को मिल रही है। सूखे की इस अवस्था में सेब के पौधों में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ न करें। इस रोग से बचाव के लिए जनवरी के अंत और फरवरी की शुरुआत में, यानी सुसुप्त अवस्था के अंतिम चरण में प्रूनिंग करें और कैंकर प्रभावित स्थानों पर मोटे कट लगाकर रोगग्रस्त हिस्से को हटा दें। कैंकर से खराब हुई खाल को तब तक निकालते रहें, जब तक वहां स्वस्थ खाल न दिखाई दे। इसके बाद नौणी विश्वविद्यालय की ओर से अनुमोदित पेस्ट को प्रभावित स्थानों पर लगाएं। अंत में बोर्डो मिश्रण का छिड़काव करें।
उषा शर्मा, प्रभारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र शिमला